1991 में केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की वित्तमंत्री के रूप में पहली पसंद मनमोहन सिंह नहीं थे। राव की पहली पसंद प्रसिद्ध अर्थशास्त्री आईजी पटेल थे।
रिटेल में एफडीआई को अनुमति देने की बहस के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों की याद दिलाई थी। नरसिंह राव की सरकार में वित्त मंत्री रहे सिंह को उदारीकरण और नई आर्थिक नीतियों का जनक माना जाता है। मगर, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार शंकर अय्यर की शीघ्र आने वाली किताब से यह धारणा टूट सकती है।
इसी महीने प्रकाशित हो रही अय्यर की किताब, ‘एक्सीडेंटल इंडिया- ए हिस्ट्री ऑफ द नेशंस पैसिज थ्रू क्राइसिस एंड चेंज’ में आजादी के बाद से देश की आर्थिक नीतियों की पड़ताल की गई है। इसमें दावा किया गया है कि लाइसेंस कोटा परमिट राज की खामियां तो साठ के दशक में ही उजागर हो गई थीं।
किताब के मुताबिक लाल बहादुर शास्त्री ने 1966 में ही इस व्यवस्था को खत्म करने की कोशिश शुरू कर दी थी। दिलचस्प तो यह भी है कि वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह नरसिंह राव की पहली पसंद नहीं थे। राव की पहली पसंद प्रसिद्ध अर्थशास्त्री आई.जी. पटेल थे।
वैसे अय्यर का आकलन है कि तत्कालीन परिस्थितियों और आर्थिक संकट के चलते राव आर्थिक सुधारों के लिए बाध्य हुए थे। राव और मनमोहन सिंह दोनों को उदारीकरण के रास्ते पर चलने से पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की 25 शर्तों को मानने को मजबूर होना पड़ा था।
किताब में अय्यर ने सात उदाहरणों के जरिए भारत की प्रगति का जिक्र किया है। ये उदाहरण आजादी के बाद हर दशक से संबंधित हैं और इनमें देश में दुग्ध क्रांति से लेकर सूचना के अधिकार तक का जिक्र है। पुस्तक में दावा किया गया है कि देश के बदलाव में अहम भूमिका निभाने वाले ये सात कदम दूरदृष्टि या सावधानीपूर्ण योजना की नहीं, बल्कि बड़े संकट की आकस्मिक परिस्थितियों का परिणाम हैं।