चार राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ सवाल छलककर सोनिया गांधी के आंगन में भी गिर रहे हैं।
यह स्वाभाविक भी है कि कांग्रेस की करारी हार के बाद ये सवाल पूछे जाएं और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी से उनकी तुलना हो।
लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने रविवार को एक राजनीतिक दांव खेला है। चुनाव परिणामों के बाद उठ रहे सवालों को दरकिनार करने की कोशिश किए बिना।
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यह दांव है चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदार की घोषणा करने का। पता नहीं कि ये घोषणा कब होगी।
हो सकता है कि इसमें कई लोग कोई राजनीति या रणनीति शायद न देख पाएं। हो सकता है कि उनके लिए यह राहुल गांधी की दावेदारी को वैधता प्रदान करने की कोशिश भर हो।
लेकिन यह इतना आसान दांव नहीं है। यह शतरंज की ऐसी चाल की तरह है जिसका असर हो सकता है कि चार-पांच दूसरी चालों के बाद दिखे।
यह दांव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए परेशान करने वाला हो सकता है। वैसे उनकी इस परेशानी की शुरुआत जयपुर में कांग्रेस के उस सम्मेलन से हो चुकी थी, जिसमें राहुल की कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में ताजपोशी हुई थी।
यह परेशानी उस दौरान और बढ़ गई जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया। इसके बाद से राजनीतिक लड़ाई मोदी बनाम राहुल ही हो गई।
मनमोहन सिंह पिछले कुछ समय से ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे हैं जिनकी सरकार अनिर्णय में फंसी हुई है। नीतिगत निर्णय लिया जाना ठप है। नीति-सन्निपात की स्थिति है, जिसे अंग्रेजी में पॉलिसी पैरालिसिस कहते हैं।
भ्रष्टाचार के जो आरोप केंद्र सरकार पर लगे हैं, उसने भी मनमोहन सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। भाजपा ने राज्य के चुनावों में भी केंद्र सरकार पर लगे आरोपों को मुद्दा बनाया।
उनका दावा है कि उनके पक्ष में पड़े वोट दरअसल केंद्र सरकार के खिलाफ पड़े वोट हैं। भाजपा के इस दावे से कांग्रेस सहमत नहीं होगी। यह उसके लिए अच्छा नहीं है। लेकिन भाजपा को यह सुविधाजनक लगता है।
राज्यों के चुनाव के दौरान इस मुद्दे ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकारों की अपनी नाकामियों से सफलतापूर्वक ध्यान बंटा लिया।
दूसरे इसने विधानसभा चुनावों के दौरान भी लोकसभा चुनावों के लिए चुने गए प्रधानमंत्री पद के दावेदार को स्थापित करने में सहायता की।
मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारु ने सलाह दी है कि लेम-डक यानी अधिकार-विहीन तेज-विहीन सरकार भी बहुत कुछ कर सकती है। उन्हें अब अपने पुराने सलाहकार की बात सुनने की जरुरत नहीं है लेकिन वे बात पते की ही कह रहे हैं।
अभी भी अगले लोकसभा चुनाव को छह महीने हैं। मनमोहन सिंह चाहें तो अपनी सरकार पर लगी धूल झाड़कर उसकी एक नई छवि सामने रखने की कोशिश कर सकते हैं।
लेकिन संजय बारु का यह सवाल वाजिब है कि क्या मनमोहन सिंह और उनके वित्तमंत्री पी चिदंबरम क्या राहुल-सोनिया की लोकलुभावन योजनाओं के लिए और पैसे देने को तैयार हैं?
पता नहीं कि इस समय दस जनपथ क्या सोच रहा है। पता नहीं वो अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में किसे पेश करेंगे। हो सकता है कि वो राहुल गांधी न भी हों।
चाहे वो जो भी हों लेकिन इतना तय है कि नए दावेदार की घोषणा होते ही मनमोहन सिंह एकाएक पहले से कम हो चुका अपना वजन और खो देंगे। तब उन्हें अपने पद पर बने रहना अव्यवहारिक और चुनौतीपूर्ण लगने लगेगा।
मनमोहन सिंह कहने को तो राजनीतिक व्यक्ति नहीं है। कम से कम उन्होंने अपनी छवि इसी तरह की बना रखी है। हालांकि जब मौका मिला उन्होंने साबित किया कि वे देश के किसी भी राजनीतिक व्यक्ति से कम राजनीतिक नहीं हैं।
अपने राजनीतिक विवेक का इस्तेमाल करके मनमोहन सिंह को अपने लिए रास्ता चुनना होगा जो दस बरस तक प्रधानमंत्री रहने की उनकी उपलब्धि के साथ उनके आत्मसम्मान को बचाए रखे।
इसका एक रास्ता ये है कि उन्हें अपना पद छोड़ देने का प्रस्ताव भी पार्टी के समक्ष रखना चाहिए जिससे कि पार्टी न केवल प्रधानमंत्री पद के नए दावेदार चेहरे के साथ चुनाव में न जाए, बल्कि उसी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चुनाव में जाए। हो सकता है कि सोनिया गांधी और उनकी धार खो चुकी मंडली यही सोच रही हो।