दो दिन, दो दौरे। पहला प्रदेश की सरकार और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का और दूसरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी का।
दोनों दौरों के सियासी मकसद अलग-अलग रहे। अखिलेश यादव ने जहां कुछ हद तक दोनों पक्षों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश की वहीं प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष ने मुस्लिमों की भावनाओं को सहलाकर देश भर के अल्पसंख्यकों को संदेश देने का प्रयास किया।
मुस्लिम मन को पढ़ने में पीएम और कांग्रेस नेता अखिलेश यादव से इक्कीस रहे। मुजफ्फरनगर-शामली के ग्रामीण इलाकों में पहली बार बड़े पैमाने पर हिंसा के बाद सियासी नफे-नुकसान का आंकलन शुरू हो गया है।
अगले साल के शुरू में लोकसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा राजनीतिक दल वोटों का गणित बैठाने में जुट गए हैं। पश्चिमी यूपी के करीब एक दर्जन जिलों में बड़ी तादाद में मुस्लिम आबादी हैं, इसलिए उन्हें लुभाने की सियासी कोशिशें और तेज हो गई हैं।
इसी को ध्यान में रखकर रविवार को अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर-शामली के दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया तो सोमवार को मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, राज्यपाल बीएल जोशी और गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह मुजफ्फरनगर जिले में दुख दर्द बांटने आए। शांति बहाली की अपील के साथ ही दोनों की मकसद सियासी भी रहा।
अखिलेश ने की चिंगारी शांत करने की कोशिश
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का रविवार का दौरा इस तरह प्लान किया गया कि मुसलमानों के जख्मों पर मरहम लग जाए और हिंदुओं खासतौर से जाट समुदाय की भावनाएं भी आहत न हों।
लिहाजा वह कवाल में मृतक शाहनवाज के पिता से मिले तो मलिकपुरा जाकर मृतक गौरव और सचिन के परिजनों को भी सांत्वना दी।
वह कांधला और बसीकलां के राहत शिविरों में गए तो कुटबा गांव में दंगे से हुए नुकसान का जायजा लेने के साथ ही दूसरे पक्ष के तीन लोगों से भी मिले।
कांधला के शिविर में उन्होंने घरों को जलाए जाने का जिक्र किया तो ट्रैक्टरों को आग लगाने का भी। एक पक्ष के घर जले हैं तो दूसरे पक्ष के ट्रैक्टर।
दौरे में अपने साथ कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र चौधरी को भी शायद यही संदेश देने के लिए लाए गए थे कि प्रशासन और सरकार निष्पक्ष कार्रवाई करेगी। वे एक तरह से अभी तक इकतरफा कार्रवाई के आरोपों को कुछ हद तक धोने की कोशिश कर रहे थे।
देकर भी घाटे में सपा, बिना दिए कांग्रेस को लाभ
पीएम और कांग्रेस नेताओं ने सोमवार को बसी कलां और तावली के कैंपों में कोई घोषणा नहीं की। मीडिया से बात भी नहीं की। इसके बावजूद कांग्रेस के प्रति सहानुभूति का माहौल दिखा।
लोगों को उम्मीद है कि इतने बड़े नेता आए हैं तो दंगा पीड़ितों के लिए राहत का ऐलान भी होगा। इसके विपरीत रविवार को अखिलेश यादव को कवाल में विरोध का सामना करना पड़ा।
अखिलेश ने हर मृतक के एक-एक परिजन को नौकरी देने और पीड़ितों के घर बसाने की घोषणा की थी। इसके बावजूद उन्हें अपेक्षित सहानुभूति नहीं मिली।
शायद प्रदेश सरकार का मुखिया होने, स्थानीय नेताओं से नाराजगी और दंगे की भयावहता का खामियाजा उन्हें नाराजगी के रूप में उठाना पड़ा।