राहुल गांधी की टीम मान रही है कि 'मनमोहन फैक्टर' नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में इजाफा कर रहा है। दस साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह की अप्रभावी इमेज कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के साथ साथ मोदी की लोकप्रियता में इजाफा कर रही है।
चुनाव प्रचार का काम देख रही राहुल गांधी की टीम को इस समय अपने प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति खल रही है।
टीम को लगता है कि अपने कार्यकाल में मनमोहन सिंह कभी भी एक कद्दावर प्रधानमंत्री के तौर पर उभर कर सामने नहीं आ पाए और इसी के कारण मतदाता मोदी के आक्रामक व्यक्तित्व के मोह तले खिंचा जा रहा है।
'सीएम' के आगे कमजोर पड़ गया पीएम
सूत्रों के मुताबिक टीम राहुल समझ चुकी है कि चुनाव जीतने के लिए केवल राहुल और सोनिया का प्रचार काम नहीं कर पाएगा। अगर कांग्रेस प्रधानमंत्री कुछ हद तक मुखर होते तो कांग्रेस अपने दस साल की कुछ उपलब्धियों को भुना पाती। लेकिन मामला ठीक उलट है।
मनमोहन की अप्रभावी इमेज कांग्रेस को फायदे के बजाय नुकसान पहुंचा रही है।
टीम को लगता है कि एक प्रदेश के सीएम के मुकाबले एक देश का पीएम ज्यादा कमजोर साबित हुआ है और इसका असर मतदाता की सोच पर जरूर पड़ेगा।
आखिर क्यों खामोश हैं मनमोहन
सवाल ये भी उठ रहा है कि आखिर दस साल तक देश की बागडोर संभालने वाले मनमोहन सिंह एकाएक चुप कैसे हो गए हैं।
मनमोहन न तो रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और न ही बयान दे रहे हैं। चुनावी वक्त में तो कम से कम मनमोहन को मुखर होना चाहिए।
दूसरी बात ये भी सामने आ रही है कि मुखर व्यक्तित्व न होने के चलते सोनिया गांधी ने एक बार भी मनमोहन से प्रचार करने का आग्रह नहीं किया है।
घोटालों ने किया बंटाधार
टीम राहुल को लगता है कि डिसीजन मेकर न होने के साथ-साथ मनमोहन में एक कमी ये भी रही कि वो कभी खुलकर सामने नहीं आए।
प्रधानमंत्री होने के नाते मनमोहन यूपीए के काल में कोयला और टेलीकॉम घोटालों को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे और इसी के चलते भाजपा को चुनाव प्रचार में कांग्रेस पर हावी होने का मौका मिल गया।