मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव भाजपा से अधिक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अग्नि परीक्षा हैं। हालांकि उनके समक्ष पिछले चुनावों की तरह अब भी बिखरी हुई कांग्रेस है और पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को तनिक भी चुनौती नहीं है। कमोबेस ये सहूलियतें हीं शिवराज की मुश्किल भी हैं।
गुजरात के मुख्यमंत्री के नरेंद्र मोदी को भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है लेकिन पार्टी के भीतर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अब भी उनके लिए अहम चुनौती माना जा रहा है।
शिवराज के नेतृत्व में भाजपा तीसरी बार मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहती हैं तो नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती और बढ़ेगी। लेकिन वे हारते हैं तो ये न केवल कांग्रेस को एकजुट होने का मौका देगा, बल्कि उमा भारती जैसे उनके धुर विरोधी मध्य प्रदेश की राजनीति में तेजी से वर्चस्वशाली हो जाएंगे।
चुनावी मैदान में शिवराज
भाजपा के अन्य नेताओं की तरह शिवराज सिंह चौहान भी आरएसएस की नर्सरी की ही उपज हैं। 1977 में 18 वर्ष की उम्र में ही संघ से जुड़ गए थे।
एबीवीपी और भाजयुमो जैसे संगठनों मे काम करने के बाद वे 1990 मे पहली बार बुधनी विधान सभा क्षेत्र से विधायक बनें। 1991 में विदिशा संसदीय क्षेत्र से वे पहली बार सांसद चुने गए थे। विदिशा से वे चार बार लोकसभा के लिए चुने गए।
2003 में मध्यप्रदेश में भाजपा बिजली, सड़क और पानी के मुद्दे पर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में कामयाब रही। लेकिन दो साल तक स्थायी नेतृत्व देने में असफल रही।
उमा भारती और बाबूलाल गौर को आजमाने के बाद पार्टी ने 25 नवंबर 2005 को शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी, तब से वे इस पद पर बने हुए हैं।
2008 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में बहुमत हासिल किया था। पार्टी उनके नेतृत्व में एक बार फिर चुनावी मैदान में है।