दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का धरना खत्म कराने के लिए परदे के पीछे कोशिशें मंगलवार सुबह से शुरू हो गई थीं।
केंद्र ही नहीं, धरने को लेकर आलोचना झेल रही दिल्ली सरकार भी चाहती थी कि कोई रास्ता निकालकर जल्द से जल्द गतिरोध तोड़ा जाए। धरना खत्म कराने में अहम भूमिका दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग की रही।
जाम और मेट्रो स्टेशन बंद होने से लोगों को हो रही परेशानी और गणतंत्र दिवस समारोह करीब होने के चलते केजरीवाल के लिए भी धरने को ज्यादा लंबा खींचना मुश्किल हो रहा था।
दूसरी तरफ केंद्र और कांग्रेस की भी फजीहत हो रही थी। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे पर रिश्वत लेने के आरोप से भी कांग्रेस असहज महसूस कर रही थी।
जंग और योगेंद्र की हुई मुलाकात
बीच का रास्ता निकालने की कोशिशों के बीच उप राज्यपाल जंग और आप के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव की मंगलवार को लंच पर मुलाकात हुई।
सूत्रों के मुताबिक इस दौरान जंग ने प्रस्ताव रखा कि यदि मैं कोई प्रस्ताव लेकर आऊं तो क्या केजरीवाल उसे मानेंगे। इस पर योगेंद्र ने कहा कि वह इस पर केजरीवाल से बात करेंगे।
जंग खुद भी केजरीवाल से लगातार फोन पर संपर्क में थे। दोपहर बाद केजरीवाल की प्रेस क्लब में हुई बैठक में फैसला लिया गया कि अगर सरकार बीच का रास्ता निकालने की पहल करती है तो धरना खत्म कर दिया जाएगा।
शिंदे नहीं थे समझौते के पक्ष में
सूत्रों के मुताबिक शिंदे ने केजरीवाल के धरने को बुधवार शाम तक अपने हाल पर छोड़ देने का राजनीतिक फैसला ले लिया था।
लेकिन उनके इस फैसले को दरकिनार कर उपराज्यपाल ने गतिरोध तोड़ने का रास्ता निकालने के लिए सीधे पीएमओ के अधिकारियों से बात की। वह कैबिनेट सचिव से भी संपर्क में थे।
गणतंत्र दिवस समारोह के मद्देनजर मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केंद्र ने जंग को केजरीवाल से अनशन खत्म करने की गुजारिश करने को कहा।
तब जंग ने दो एसएचओ को छुट्टी पर भेजने की पेशकश केजरीवाल के सामने रखी, जिसके बाद केजरीवाल ने धरना खत्म कर दिया।
आखिर, धरने से क्या हासिल हुआ?
1-क्या यह सही मायनों में दिल्ली की जीत है, जैसा कि केजरीवाल दावा कर रहे हैं। जबकि दिल्ली के लोगों को धरने के चलते जाम और मेट्रो की दिक्कत से जूझना पड़ा।
2-केजरीवाल अपने मंत्रियों से उलझने वाले पुलिस अफसरों के निलंबन की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे, लेकिन बात तबादले पर आई और अंत में दो अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने पर ही मान गए।
3-क्या इसके लिए धरने की जरूरत थी। क्या दिल्ली सरकार की उप राज्यपाल और केंद्र से बातचीत में यह सहमति नहीं बन सकती थी।
4-चूंकि यह धरना सीधे जनता के मुद्दों से नहीं जुड़ा था, इसलिए जनसमर्थन भी जोरदार ढंग से नहीं मिला और कदम पीछे खींचने पड़े।