सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पुलिस प्रेम विवाह करने वालों को बेवजह परेशान करने से बाज आए। यह कोई जुर्म नहीं है, हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपने मनमुताबिक जीवनसाथी चुने। इस अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणी अपने पिछले आदेश की अवहेलना पर राजस्थान के अलवर जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को तलब करते हुए दी।
सर्वोच्च अदालत ने 13 दिसंबर को प्रेमी जोड़े को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश जारी किया था। साथ ही अगली सुनवाई में दोनों को अदालत में पेश होने को कहा था लेकिन पुलिस ने लड़की के परिजनों की ओर से दर्ज एफआईआर पर दोनों को अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर दिया। जहां मजिस्ट्रेट ने लड़की को नारी निकेतन भेज दिया।
चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मजिस्ट्रेट से भी स्पष्टीकरण मांगा है कि शीर्ष अदालत के आदेश की जानकारी के बावजूद लड़की को आखिर क्यों नारी निकेतन भेजा गया। लड़की का बयान आखिर क्यों दर्ज नहीं किया गया। जान-माल की रक्षा के लिए नवविवाहिता फिरदौस व उसके पति नसीर ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर की है।
फिरदौस के परिजनों ने नसीर के खिलाफ अपहरण करने की शिकायत थाने में दर्ज करायी है। पीठ के समक्ष दंपति की ओर से पेश हुए अधिवक्ता जेपी ढांडा ने कहा कि शीर्षस्थ अदालत के आदेश के बावजूद पुलिस बेवजह दंपति को परेशान कर रही है। इस पर पीठ ने कहा कि प्रेम विवाह कोई जुर्म नहीं है, अदालत पुलिस के खिलाफ सख्त आदेश जारी करेगी लेकिन इससे पहले जिले के शीर्ष पुलिस अधिकारी को तलब करेगी।
पीठ के समक्ष पेश हुए पति नसीर ने आप-बीती सुनाते हुए बताया कि पुलिस और मजिस्ट्रेट ने किस तरह से शीर्ष अदालत के आदेश को नजरअंदाज कर दिया। पीठ ने कड़ी नाराजगी जताते हुए अलवर के एसएसपी को सोमवार (सात जनवरी) को सुप्रीम कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने हालांकि इस मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 13 दिसंबर के आदेश में दंपति के खिलाफ कोई कार्रवाई न किए जाने और उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश पुलिस को दिया था।