क्या आपने कभी सोचा है क्यों बाहुबली नेता चुनाव चिह्न तमंचा या अर्थी नहीं लेते और अमीर प्रत्याशी नोट की गड्डी चुनाव चिह्न नहीं लेते।
जिन प्रत्याशियों को चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या प्रांतीय पार्टियों से टिकट मिल गया है उनके चिह्न का तो मसला नहीं है। पर जो निर्दलीय लड़ना चाहते हैं वो ज़ाहिर तौर पर ऐसा चिह्न लेना चाहते हैं जो उनके मतदाताओं का दिल और वोट दोनों जीत सकें।
मसलन हर चुनाव में कई ऐसे बेहद अमीर प्रत्याशी निर्दलीय खड़े होते हैं जो जनता के बीच केवल अपने पैसे की बदौलत ही जाने जाते हैं और वो ऐसा ही चाहते भी हैं।
चुनना मगर ध्यान से!
ऐसे कई प्रत्याशियों पर आरोप लगता है कि वो "वोटरों के बीच पैसा बाँट रहे हैं।" प्रत्याशियों से उनका मनपसंद चुनाव चिह्न पूछा जाए तो उनमें से कई नोटों की गड्डी या नोट भरा लिफ़ाफ़ा या शराब की बोतल जैसे चुनाव चिह्नों को शर्तिया अपनाना चाहेंगे।
लेकिन इस तरह के तमाम ख़्वाहिशमंदों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है भारत का चुनाव आयोग। भारत के चुनाव आयोग के सलाहकार केजे राव कहते हैं कि चुनाव चिह्नों को लेकर चुनाव आयोग का रुख़ शुरू से ही बहुत सख़्त है।
75 चुनाव चिह्नों में से ही किसी एक को चुनना
निर्दलीय प्रत्याशियों की मज़बूरी है कि उन्हें चुनाव आयोग के तयशुदा 75 चुनाव चिह्नों में से ही किसी एक को चुनना होगा।
वैसे इन तयशुदा चिह्नों में से कई ऐसे हैं जिनका मज़ाक बनाना आसान हैं।
मसलन 'कैंची' का चुनाव चिह्न लेने वाले के बारे में उसके विरोधी कह सकते हैं कि ये सबकी जेब काट लेंगे। या जिसका चुनाव चिह्न गुब्बारा हो तो उसके विरोधी शर्तिया कहेंगे कि "इनकी हवा निकलना तय है।"
वैसे तो 'दो मोमबत्ती' का निशान बढ़िया है लेकिन दिक्क़त बस यह है कि ये दो मोमबत्तियां बुझी हुई हैं और आधी जली चुकी भी।
हाथ का पंजा कैसे आया?
अगर कोई पार्टी अपना चुनाव चिह्न बदलती है तो उसे इसका साफ़ कारण बताना होता है। राव के अनुसार चुनाव आयोग केवल पार्टी में दो फाड़ होने पर ही चुनाव चिह्न बदलने की अनुमति देता है।
कई सालों से कांग्रेस पार्टी कवर कर रहे पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं कि साल 1980 में कांग्रेस नेताओं ने हाथी और हाथ का पंजा दो चिह्न चुने थे।
इंदिरा गांधी को लगा कि कांग्रेस के लिए 'हाथी' निशान शुभ नहीं होगा और उन्होंने हाथ के पंजे का चुनाव किया।
लेकिन हाथी का निशान बहुजन समाज पार्टी ने कई सालों के बाद अपना लिया और उसे वो खूब फला। बल्कि इतना ज़्यादा फला कि कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में बसपा से बड़ी पार्टी बनना सपना हो गया है।
किदवई ये भी बताते हैं कि 1990 के दशक में जब कांग्रेस एक के बाद एक लगातार चुनाव हार रही थी तब राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दबाव के बाद पार्टी ने चुनाव आयोग से इसके चुनाव चिह्न हाथ के पंजे के भीतर हाथ की रेखाओं को नए ढंग से बनाने के लिए आग्रह किया था।