गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की बढ़ती संभावनाओं से लेफ्ट पार्टियां भी असमंजस में हैं।
इन्हें समझ में नहीं आ रहा कि वह 2014 के चुनाव से पहले गैर कांग्रेस और गैर भाजपा दलों को पूर्व घोषित आर्थिक नीतियों के खिलाफ गोलबंद करे या फिर से सांप्रदायिकता बनाम धर्म निरपेक्षता के बहाने इन्हें एकजुट करने का प्रयास करे।
समस्या यह है कि केरल यूनिट अब भी आर्थिक नीतियों के खिलाफ लड़ाई को चुनाव में ले जाने के पक्ष में है, तो पश्चिम बंगाल यूनिट को लगता है कि इसके सहारे तीसरे मोर्चे का गठन आसान नहीं होगा। हालांकि फिलहाल इस विषय पर वाम दलों के नेता सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी से बच रहे हैं।
वाम दल यूपीए सरकार से वर्ष 2008 में समर्थन वापस लेने के बाद से ही आर्थिक नीतियों के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की नीति पर काम कर रहे हैं। मगर मोदी के पीएम पद के दावेदार के रूप में उभरने से वह असमंजस की स्थिति में आ गए हैं।
पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा यूनिट को लगता है कि नई परिस्थितियों में स्टैंड में बदलाव लाने की जरूरत है। हालांकि केरल यूनिट अब भी आर्थिक नीतियों के खिलाफ ही आगे बढ़ने का पक्षधर है।
माकपा के पश्चिम बंगाल के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि हम 2009 के चुनावों में इसी कारण सशक्त तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं कर पाए।
भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने के कारण पूरे चुनाव का केंद्र सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता हो गया। हम तब भी आर्थिक नीतियों को ही मुख्य मुद्दा बनाए रहे। अब 2014 में मोदी के सामने आने से ठीक ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई है।