1970 का दशक। उत्तर प्रदेश की एक चुनावी बैठक। 'यह छोटे कद का बड़ा नेता है।' चौधरी चरण सिंह एकाएक बोले। सब सन्न थे। लेकिन किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। दरअसल मीटिंग में आया हर शख्स इस टिप्पणी के पीछे छिपे सच को महसूस कर रहा था।
बात उस युवा समाजवादी की हो रही थी जो धीरे-धीरे बेहद सधे हुए कदमों के साथ राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। यह मुलायम सिंह यादव का जवानी का दौर था।
तब बेशक उनका काफी समय अखाडो की धूल फांकते हुए बीतता था, लेकिन तब किसे पता था कि डॉ. राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण्ा सिंह को अपना राजनीतिक आदर्श मानने वाला यह उत्साही युवक राजनीति के अखाड़े का भी बड़ा पहलवान साबित होगा।
उनके बारे में कहा जाता है कि समाजवाद के फ्रांसीसी पुरोधा कॉम डी सिमॉन की अभिजात्यवर्गीय पृष्ठभूमि के ठीक उलट उनका यह भारतीय संस्करण केंद्रीय भारत के एक गांव सैफई के अखाड़ों में तैयार हुआ, और यहीं से उसने राजनीति के पैंतरे भी सीखे।
1996 में प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे
पिछले डेढ़ दशक इसके गवाह रहे हैं कि किस तरह राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में बेहद उतार-चढ़ाव वाले हालात में मुलायम सिंह यादव असाधारण राजनीतिक कौशल के साथ भारतीय राजनीति में अपनी जरूरत का एहसास कराते आए हैं।
इस दौरान मुलायम गैर कांग्रेस और गैर भाजपा की राजनीति के ध्रुवीकरण का चेहरा बन कर उभरे हैं। कौन भूल सकता है कि 1996 में वह देश के प्रधानमंत्री बनने की दहलीज तक पहुंच गए थे, लेकिन तब यादवों (शरद, लालू और मुलायम) की लड़ाई में एच. डी. देवेगौड़ा बाजी मार गए थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं।
आज देश फिर से उस मोड़ पर खड़ा है जहां से उनके लिए 7, रेसकोर्स का रास्ता खुलता है। हालांकि इस दौरान कई बार उनकी राजनीति को कटघरे में खड़े करने की कोशिशें भी हुईं। कुनबापरस्ती और अवसरवादी राजनीति करने के आरोप लगे।
लेकिन जब बात अपना उत्तराधिकारी चुनने की आई तो साइकिल का हैंडल उन्होंने अपने पुत्र अखिलेश यादव को ही थमाया। रही बात मौकापरस्त होने की तो मिले हुए अवसरों को भुनाना ही तो सियासत है। और मुलायम इस खेल में माहिर हैं।
पहली बार जसंवत नगर से बने विधायक
वैसे मुलायम सिंह के राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत 1967 में हुई, जब संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर वह इटावा में यादवों का गढ़ मानी जाने वाली जसवंत नगर सीट से विधायक चुने गए।
लेकिन पहली बार मंत्री बनने के लिए उन्हें 1977 तक इंतजार करना पड़ा जब कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चल रही थी, और उत्तर प्रदेश में जनता सरकार बनी।
इसके बाद मुलायम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे समय में जब डॉ. लोहिया के निधन के बाद देश में समाजवादी आंदोलन मरणासन्न हालत में पहुंच गया था, 1992 के नवंबर महीने की उस सर्द दोपहर में पूरे देश की नजर लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क पर थी। समाजवादी पार्टी के इस स्थापना सम्मेलन में मुलायम ने समाजवादी आंदोलन को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई।
प्रसिद्ध समाजवादी लेखक लक्ष्मी कांत वर्मा अपनी किताब ‘समाजवादी आंदोलन-लोहिया के बाद‘ में लिखते हैं, '10-12 वर्ष आशा-निराशा से भरे अनुभवों से गुजरने के बाद जब मुलायम सिंह ने 1992 में डॉ. लोहिया का नाम लेकर और उनके समस्त रचनात्मक कार्यक्रमों को स्वीकारते हुए समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया तो वह ना तो गांधी थे और ना ही लोहिया।
वह केवल अपने युग के एक जागरूक व्यक्ति के रूप में पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे।’’बाबरी मस्जिद टूटने के पश्चात् जब उत्तर प्रदेश की राजनीति ने सांप्रदायिक करवट ली, उस दौरान दौरान मुलायम सिंह को राज्य के मुसलमानों का भरपूर समर्थन मिला और 'मौलाना मुलायम' का नाम भी।
राजनीतिक अवसरवाद का पर्याय भी
नेता के तौर पर मुलायम की पहचान हमेशा दो अतियों के बीच झूलती रही। एक ओर जहां उन्हें जाति और धर्म आधारित राजनीति करने वाला जमीनी नेता कहा गया, वहीं दूसरी ओर उन्हें राजनीतिक अवसरवाद का पर्याय कहा गया।
लेकिन अगर वास्तव में मुलायम को समझना है तो उनकी शख्सियत को समग्रता में समझना होगा। दरअसल मुलायम एक ऐसे नेता हैं जो सत्ता के शीर्ष पर होना चाहते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें अपनी सीमाएं भी पता हैं। और यही बात उन्हें नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू, जयललिता, ममता बैनर्जी और लालू प्रसाद यादव जैसे क्षेत्रीय राजनीति करने वाले दूसरे नेताओं से अलग करती है।
यह आलोचना बेशक हो कि मुलायम समय-समय पर विचारधारा से समझौता करते दिखे। लेकिन पार्टी को मजबूत बनाने के उनके इरादों पर उंगली नहीं उठाई जा सकती।
दरअसल पहलवानी के खेल का तरीका यह है कि खुद को बचाते हुए सामने वाले पर प्रहार किया जाए। जायज या नाजायज किसी भी जरिये से आसन्न संकट से खुद को बचा कर निकाल ले जाने की कला मुलायम से सीखी जा सकती है। ऐसे कई मौके आए जब उन्होंने राजनीतिक चौसर पर ऐसे दांव चले कि लोग हतप्रभ रह गए।
हर दौर में बनाए रखी पकड़
1967 में पहली बार राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के टिकट पर विधायक चुने गए। लेकिन लोहिया के निधन के तुरंत बाद 1968 में वह चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय क्रांति दल में शामिल हो गए। जब संसोपा और भारतीय क्रांति दल को मिलाकर भारतीय लोकदल (बीएलडी) बनाया गया, तो मुलायम सिंह यादव ने इस पर भी अपनी पकड़ बनाए रखी।
इतना ही नहीं, जब 1977 में बीएलडी का जनता पार्टी में विलय हुआ तो मुलायम सिंह मंत्री बने। ऐसे ही 1989 में वी.पी. सिंह कांग्रेस से विद्रोह करते हुए जनता दल सरकार बनाने की कोशिशों में थे। देवीलाल उनके साथ थे। दूसरी ओर चंद्रशेखर थे, जो खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने की जोड़-तोड़ में लगे थे।
यह वह वक्त था जब मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी से उभर रहे थे, और चंद्रशेखर के साथ खड़े दिखते थे। लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने पाला बदला और वी. पी. सिंह को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा दिया। संघ परिवार के खिलाफ अपने कठोर रुख के चलते वामपंथियों ने उन्हें हमेशा अपने दोस्त्ा के तौर पर देखा।
लेकिन अमेरिका से परमाणु समझौते के मसले पर जब वामपंथियों की ओर से केंद्र सरकार संकट में पड़ी, तो मुलायम सिंह ने कांग्रेस का खेवनहार बनने का फैसला लेने में तनिक भी देर नहीं लगाई। ऐसे ही वर्तमान राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान भी ममता बैनर्जी को ठेंगा दिखाते हुए उन्होंने कांग्रेस की परेशानियों को कम किया।
सत्ता को लेकर मुलायम
दरअसल, कब और कहां गिड़गिड़ाना है और कहां अपनी धौंस जमानी है, यह कला राजनीति के स्कूल के विद्यार्थियों को मुलायम से बेहतर कोई नहीं सिखा सकता।
वैसे भी जब बात सत्ता पाने की हो तो फिर मुलायम उन राजनीतिज्ञों में से नहीं हैं, जिनका स्वाभिमान उनके आड़े आए। सच तो यह है कि सत्ता को लेकर मुलायम वाकई 'मुलायम' हैं। हालांकि यह भी सच है कि जातीय और धार्मिक समीकरणों को उनके जैसी गहराई से समझने और साधने की कला आज के दौर के कम राजनीतिज्ञों में नही दिखती है।
मुस्लिम वोट बैंक के कोषाधीश माने जाने वाले मौलाना अब्दुल्ला बुखारी से एक बार उन्होंने कहा, ‘आपका काम मस्जिद के भीतर है बाहर राजनीति का काम हमारा है।’ दरअसल जमीन से जुड़े होने के साथ ही मुलायम सिंह लोगों की नब्ज पहचानते हैं।
शायद यही वजह है कि ऐसे बयान के बाद भी मुसलमानों का उन पर भरोसा कायम रहा। बावजूद इसके दुनिया जानती है कि वह हनुमान भक्त हैं, जैसे कि आमतौर पर सभी पहलवान होते हैं।
हां, राजनीतिक मंच पर मुलायम सिंह और अमर सिंह का एक साथ दिखाई देना जरूर आश्चर्यजनक था। एक समाजवादी नेता, तो दूसरा महत्वाकांक्षी उद्योगपति।
एक जमीन से जुड़ा खांटी नेता, तो दूसरा घनघोर राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाला एक अराजनीतिक व्यक्ति। हालांकि एक अलग नजरिये से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि इसमें इतने आश्चर्य की भी कोई बात नहीं है। सबसे मेलजोल बनाए रखना मुलायम की शख्सियत का हिस्सा रहा है।
अमर सिंह ने पार्टी को ग्लैमरस बनाया
मुलायम सिंह यादव के विद्यार्थी जीवन के एक मित्र रामरूप यादव बताते हैं, 'हर किसी से बात करना मुलायम के स्वभाव में शुरू से ही रहा है। वह हमेशा एक मिलनसार व्यक्ति रहे हैं।'
अतीत गवाह है कि समय-समय पर सभी के साथ मेलजोल बढ़ाया, फिर चाहे वह वामपंथी दल हों, कांग्रेस हो या कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी। राष्ट्रीय और प्रदेश की राजनीति में अपना कद बढ़ाने के लिए वह भारतीय जनता पार्टी तक से नजदीकी बढ़ाते देखे जा चुके हैं।
दरअसल अमर सिंह के रूप में उन्हें ऐसा हमदर्द मिला जो अच्छी तरह जानता था कि राजनीतिक और कार्पोरेट हितों में संतुलन कैसे साधा जाता है। अमर सिंह की व्यापार वार्ताओं को मुलायम ने राजनीतिक प्लेटफॉर्म भी दिया।
कुछ भी हो, फायदा दोनों ने ही उठाया। अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी को ग्लैमरस बनाया। बड़े-बड़े फिल्म स्टार और कार्पोरेट जगत के नामी चेहरे पार्टी के साथ जुड़ने लगे।
गांव की चौपालों में होने वाली पार्टी की बैठकें अब्ा फाइव स्टार पृष्ठभूमि में होने लगी थीं। दरअसल पार्टी को मजबूत बनाने का कोई मौका मुलायम अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे।
अमर सिंह को पार्टी से जोड़ने के पीछे भी उनकी यही सोच काम कर रही थी। कार्पोरेट जगत से नजदीकी से पार्टी को भी फायदा पहुंचा और मुलायम सिंह को भी।
लेकिन जब मुलायम को लगा कि अमर सिंह से नजदीकी न सिर्फ पार्टी की छवि के लिए नुकसानदायक साबित हो रही है, बल्कि कई परंपरागत समाजवादी भी पार्टी से छिटक रहे हैं, तो उन्होंने अमर सिंह का बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगाई।
अपना पूरा जीवन राजनीति को दिया
एक इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें अमर सिंह की कमी खलती है? उनका जवाब था, 'नहीं, अमर सिंह के साथ कई फिल्म स्टार और उद्योगपति जरूर थे, लेकिन वह समाजवादी व्यक्ति नहीं थे, इसलिए उनके योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखा जाना चाहिए।
75 वर्ष के हो चुके मुलायम ने अपना पूरा जीवन राजनीति को दिया है। देश में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य के वह तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। ऐसे में आज अगर वह देश के प्रधानमंत्री होने की मंशा रख रहे हैं, तो इसमें गलत कुछ भी नहीं है।
लेकिन उन्हें याद होगा कि 2004 में उनके पास 36 सांसद थे और वह उत्तर प्रदेश की सत्ता में भी थे। तब दिल्ली में सत्ता के गलियारों में तमाम चक्कर लगाने के बाद भी उन्हें कुछ हासिल नहीं हो पाया था। निवर्तमान लोकसभा में भी उनके 23 सांसद हैं।
लेकिन उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था को लेकर समाजवादी सरकार पर सवाल खड़े होते रहे हैं। फिर मुजफ्फरनगर दंगों की आंच भी अभी ठंडी नहीं हुई है। इन्हीं वजहों से लोकसभा चुनावों में उनके दहाई के आंकड़े तक न पहुंच पाने की आशंका जताई जा रही है।
खैर, वह प्रधानमंत्री बन पाएं या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन इसे नहीं झुठलाया जा सकता कि उन्होंने बहुत नीचे से अपनी राजनीति की शुरुआत की और एक बड़ी जगह बनाई। वक्ता वह भले ही कैसे भी हों, उच्चारण बेशक साफ न हो, लेकिन जब वह बोलते हैं तो गौर किया जाता है।
क्या यह कम बड़ी बात है। उनकी राजनीति में दोष ढूंढे जा सकते हैं, लेकिन इस मामले कौन-सा नेता अपवाद है। आखिर उनमें कुछ बात तो है कि दूसरों को तो छोड़िए, उनका बेटा भी उन्हें 'नेताजी' कह कर संबोधित करता है।