खाद्य सुरक्षा कानून पर 1.30 लाख करोड़ रुपए के खर्च को फिजूलखर्ची मानने वाले उद्योग जगत की नाराजगी को भूमि अधिग्रहण विधेयक और बढ़ा सकता है।
इस विधेयक के कई प्रावधानों पर उद्योग जगत कड़ी आपत्ति व्यक्त कर चुका है। खासकर भूमि अधिग्रहण में 80 फीसदी भू-स्वामियों की सहमति और मुआवजे बढ़ने से उन्हें जमीनें महंगी होने का खतरा सता रहा है।
किसानों के हितों को बचाने के लिए जो प्रावधान रखे गए हैं, उनसे उद्योग जगत को जमीनें मिलने में देरी का डर सता रहा है।
औद्योगिक संगठन फिक्की का मानना है कि नए कानून के लागू होने के बाद भूमि अधिग्रहण में 6-7 साल लग सकते हैं।
अधिग्रहण की प्रक्रिया में सामाजिक प्रभाव का आकलन करने, जन सुनवाई और 80 फीसदी भू-स्वामियों की सहमति लेने में काफी समय लगेगा।
फिक्की की ओर से ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजे मांग पत्र में भूमि के मुआवजे के साथ विस्थापन और पुनर्वास का खर्च उद्योग पर डालने को लेकर आपत्ति जताई जा चुकी है।
विधेयक के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 100 एकड़ निजी प्रोजेक्ट के लिए भी विस्थापन और पुनर्वास को अनिवार्य किया गया है। सरकारी मंजूरी न मिलने से 200 से ज्यादा बड़े प्रोजेक्ट अटके हुए हैं।
उद्योग जगत पहले ही सरकार पर नीतिगत सुस्ती के आरोप लगा रहा है। देश में निवेश और अटकी परियोजनाओं को तेजी देने के सरकार के दावों का खास असर नहीं दिखा है।
ऐसे में खाद्य सुरक्षा के बाद भूमि अधिग्रहण जैसे मसले पर सरकार को उद्योग जगत की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा।