राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में दोषी करार होने और जेल जाने के बाद उनके दल और समर्थक वर्ग दोनों में बिखराव का खतरा पैदा हो गया है।
हालाकि सीबीआई अदालत से मिली सजा के खिलाफ लालू यादव की तरफ से उच्च न्यायालय में अपील होगी, लेकिन कानूनी उलझनों और जटिलताओं की वजह से राजद में नेतृत्व संघर्ष शुरु होने की भी पूरी संभावना है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी लालू प्रसाद यादव के अलग थलग और अकेले पडऩे की संभावना बढ़ गई है। क्योंकि कांग्रेस उनसे दूर हो रही है और भाजपा पहले से उनके खिलाफ है।
कायदे से लालू यादव के राजनीतिक जीवट की असली अग्निपरीक्षा अब शुरू हुई है।
इसके पहले जब चारा घोटाले में आरोपपत्र दाखिल होने के बाद लालू की गिरफ्तारी हुई थी तब बिहार में उनकी सत्ता थी और राष्ट्रीय स्तर पर भी वह जनता दल के नेतृत्व वाले सत्ताधारी संयुक्त मोर्चे की धुरी थे।
इसलिए उनकी गिरफ्तारी के बाद जब लालू की पत्नी राबड़ी देवी को सीधे घर से निकालकर मुख्यमंत्री बना दिया गया तो पार्टी में उनके नेतृत्व को चुनौती नहीं मिली।
सत्ता के चुंबक और लालू के करिश्मे ने नेताओं को बांधे रखा। लेकिन अब परिस्थिति बदल चुकी है।
लोकसभा में राजद के सिर्फ चार सांसद हैं जिनमें एक खुद लालू हैं जो अब सजा पाते ही सदस्यता से वंचित हो जाएंगे। शेष तीनों सांसद राजपूत हैं और अगले लोकसभा चुनावों में उनके लिए सारे विकल्प खुले होंगे।
लालू के बाद राजद की कमान कौन संभालेगा। राबड़ी देवी या उनके बेटे तेजस्वी नाम से मशहूर तेजस्वी प्रताप यादव।
लेकिन अब जब बिहार में राजद सिर्फ 19 विधायक हैं और केंद्र व राज्य की सत्ता से राजद न सिर्फ बाहर है बल्कि निकट भविष्य में आने की संभावना भी नहीं है और लालू का वह करिश्मा भी खत्म हो चुका है जिसकी वजह से उनका टिकट लोकसभा या विधानसभा की गारंटी बनता था।
ऐसे में राजद के तमाम वरिष्ठ नेता राबड़ी या तेजस्वी के नेतृत्व में बने रहना कब तक मंजूर करेंगे या एक बड़ा सवाल है। वह भी तब जबकि राजद के इन नेताओं के सामने जनता दल(यू), भाजपा और कांग्रेस का विकल्प खुला हुआ है।
राजद के जिन नेताओं का धुर नीतीश विरोध है, उन पर भाजपा डोरे डालेगी, जबकि समाजवादी पृष्ठभूमि वाले रघुवंश प्रसाद जैसे खांटी नेताओं को अपनी तरफ लेने में नीतीश और कांग्रेस दोनों कोशिश कर सकते हैं।
वहीं लंबे समय तक समता पार्टी और जद(यू) में रह चुके प्रभुनाथ सिंह जैसे राजपूत नेताओं को नीतीश विरोध की वजह से भाजपा ज्यादा मुफीद लग सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की नीतीश कुमार से बढ़ती दोस्ती जगजाहिर है। ऐसे में बिहार की राजनीति को देखते लालू के सहयोगी रामविलास पासवान क्या रुख अपनाते हैं वह भी दिलचस्प होगा।
पासवान की धर्मनिरपेक्ष राजनीति उन्हें भाजपा की बजाय कांग्रेस के निकट ला सकती है, लेकिन इसके लिए उन्हें लालू का साथ छोड़कर नीतीश से दोस्ती करनी पड़ेगी।
जहां तक राजद के यादव और मुस्लिम जनाधार का सवाल है, तो इसमें ज्यादा अपील लालू के परिवार के किसी सदस्य की ही हो सकती है, किसी दूसरे नेता की नहीं।
लेकिन बड़ा खतरा है कि अगर कांग्रेस और जनता दल (यू) के बीच कोई गठबंधन होता है तो मुसलमान राजद छोड़कर उधर जा सकते हैं। ऐसे में यादवों को भी अपना नया ठिकाना खोजना पड़ सकता है।
भाजपा यादवों को अपने साथ जोडऩे की ताक में है, वहीं सामाजिक न्याय की राजनीति यादवों के एक हिस्से को जद(यू) की तरफ भी झुका सकती है।
कुल मिलाकर लालू यादव के परिवार के सामने कानूनी लड़ाई के साथ साथ अपने दल और जनाधार को बचाए रखने की राजनीतिक लड़ाई लडऩे की चुनौती भी है।