"नरेंद्र मोदी या नीतीश कुमार से कहिए, मजदूर को कुछ पैसा दे। कुछ महीना फिक्स करे, अनाज पानी दे। मजदूर को तो काम पांच दिन मिलता है और 25 दिन खाली बैठा रहता है। ऐसे में वो करेगा क्या? पेट देखेगा कि बच्चों को पढ़ाएगा।" चार बच्चों के पिता सोनेलाल यादव ने जब ये बात कही, तो राजनीति के प्रति बढ़ता अविश्वास और परिवार को पालने की चिंता दोनों उनके चेहरे पर थी।
सोनेलाल राजनगर दियर (बख्तियारपुर) से रोजाना सुबह छह बजे पटना के मुन्नाचक आते हैं और मजदूरी करते हैं। चुनावी शोर के बारे में पूछने पर कहते हैं, "यह शोर मुझे समझ नहीं आता। हमारे लिए तो वही नेता सबसे अच्छा है जो हमारे लिए काम करे। लेकिन कोई कुछ करता भी तो नहीं है।" मुन्नाचक में मजदूरों की 'मंडी' लगती है। पटना के आसपास के इलाक़ों से रोजाना यहां तकरीबन 700 मजदूर काम की तलाश में आते हैं लेकिन काम कुछ नसीब वालों को ही मिलता है। दरअसल पटना के अलग-अलग इलाक़ों में रोजाना आसपास से हजारों मजदूर सुबह जुटते हैं। लगातार हाशिए पर जाते ये मजदूर चुनावों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं। उनका कहना है कि आज तक किसी सरकार ने उनके लिए काम नहीं किया। आगे भी किसी सरकार से वे बहुत उम्मीद नहीं रखते।
राजेश्वर पासवान 70 साल के हैं लेकिन वोटर कार्ड में उनकी उम्र 45 दर्ज हो गई है। इसके चलते वो सरकारी कामकाज से बहुत नाराज हैं। राजेश्वर कहते है, "वृद्ध पेंशन नहीं मिलेगी। वोटर कार्ड वालों ने हमारे लिए मुश्किल खड़ी कर दी। अरे सरकार हो तो मजदूर को कुछ तो दो।" हालांकि अंढौली के सुनील सिंह सरकार के कामकाज से खुश दिखते हैं लेकिन मजदूरों के लिए सरकार के कुछ ना करने की नाराजगी भी है। वह कहते हैं, "नीतीश कुमार ने बहुत काम किया है। हमारे घर के पास तीन सड़कें बनवाईं हैं। आने-जाने में सुविधा हो गई है।" उन्होंने आगे कहा, "लेकिन मजदूरों के लिए कुछ नहीं किया जबकि बच्चों की शिक्षा के लिए हर जगह पैसे देने होते हैं।"