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ला नीना लौटाएगा किसानों की चेहरे की रौनक

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लगातार दो वर्ष से मौसम की मार झेल रही देश की खेती के लिए अब प्रकृति से बेहतरी की उम्मीद है। अल नीनो की मार के बाद अब ला नीना किसानों के चेहरे की रौनक लौटाएगा। वर्ष 2016-17 में आने वाला ला नीना मौसम और मानसून दोनों को खेती के अनुकूल रखेगा।
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आर्थिक सर्वेक्षण में वर्ष 2017 के लिए कृषि का पूर्वानुमान व्यक्त करते हुए कहा गया है कि समय-समय पर अल नीनो से कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। 1997 से अब तक की बात करें तो 2015 का अल नीनो सबसे प्रभावी रहा है, जिससे पिछले वर्ष पैदावार कम हुई। उम्मीद जताई गई है कि यदि इस वर्ष प्रभावी ला नीना आता है तो फसल अच्छी हो सकती है।

भारतीय मौसम विभाग के निदेशक बीपी यादव ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि 2016 के मानसून आने तक अल नीनो कमजोर पड़ जाएगा। इसके बाद ला नीना का निर्माण होगा। जिससे मानसून की स्थिति अनुकूल रहेगी।
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किसानों को झेलनी पर भारी मार

दरअसल वर्तमान अल नीनो फरवरी 2015 में शुरू हुआ था। अधिकांश जलवायु मॉडलों के पूर्वानुमान के अनुसार मई 2016 से पहले सामान्य स्थिति बहाल नहीं होगी। इक्वाडोर और पेरू के निकट प्रशांत महासागर के पानी के असामान्य रूप से गरम होने से पूरे विश्व में मौसम असामान्य हुआ है। भारत में अल नीनो का सबसे ज्यादा असर किसानों को झेलना पड़ा है।

बेमौसमी बारिश, अति ओलावृष्टि, अति वृष्टि और तेज हवा की वजह से फसलों को भारी नुकसान हुआ है। अब मौसम में सुधार की संभावना के बीच किसानों की खुशी लौट सकती है। ला नीना उनके चेहरे की रौनक लौटा सकता है।

दरअसल पिछले रिकार्ड दर्शाते हैं कि अल नीनो के बाद ला नीनो आया, जिससे फसल बहुत अच्छी हुई। रिकार्ड के अनुसार 2016 में दूसरा मजबूत अल नीनो आने के बाद ला नीना की स्थिति बनने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है। जिन वर्षों में ला नीना आया उन वर्षों में भारत में कृषि की औसत वृद्धि दर 8.4 थी, जो सामान्य अवधि की औसत से काफी ज्यादा है।

मौसम के पुराने आंकडे़ बताते हैं कि 1950 से अब तक तक 22 अल नीनो आ चुके हैं। इस अल नीनो से पहले के 21 अल नीनो के बाद ला नीना आया था।
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क्या है अल नीनो और ला नीना?

यह दक्षिणी वैश्विक मौसम के उतार चढ़ाव की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें प्रशांत महासागर का जल सामान्य से कहीं अधिक गर्म हो जाता है। इसकी वजह से दक्षिणी अमेरिका से दक्षिणी-पूर्व और दक्षिणी एशिया की ओर बहने वाली हवाओं की गति धीमी पड़ जाती है। जब मध्य प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, तब उसके ऊपर के वातावरण में शुष्कता बढ़ती है।

इसका असर मानसून पर पड़ता है। हालांकि प्रतिवर्ष अल-नीनो मानसून के लिए बुरा नहीं होता। अल-नीनो के कारण दुनिया में बाढ़, सूखा जैसे अनेक मौसमी परिवर्तन आते हैं। यह पृथ्वी की जलवायु प्रक्रिया का प्राकृतिक अंग है।

ला-नीना

यह स्वभाव में अल-नीनो के ठीक विपरीत है, क्योंकि इसके आने पर विष्वतीय प्रशांत महासागर के पूर्वी तथा मध्य भाग में समुद्री सतह के औसत तापमान में असामान्य रूप से ठंडी स्थिति पाई जाती है। कई मौसम विज्ञानी इसे अल वेइजो अथवा कोल्ड इवेंट कहना पसंद करते हैं।

स्पेनी भाषा के इस शब्द का अर्थ क्रमश: छोटा लड़का तथा छोटी लड़की है। अल-नीनो शब्द का अर्थ शिशु क्राइस्ट भी है, जो इस शब्द के उत्पत्ति से संबंध रखता है।
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