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स्मृति ईरानी के 'फरमान' से टीचर बेरोजगार

Sat, 15 Nov 2014 12:15 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बरेली, नई दिल्ली
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सभी केंद्रीय विद्यालयों में वैकल्पिक विषय के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत अनिवार्य कर दिए जाने के बाद शुक्रवार को बरेली के विद्यालयों से जर्मन शिक्षक निकाल दिए गए हैं। बीच सत्र में जर्मन की बजाय संस्कृत पढ़ने के आदेश से बच्चे भी परेशान हैं।
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अब तक केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा छह, सात और आठ के विद्यार्थी वैकल्पिक विषय के रूप में जर्मन पढ़ते थे। 11 नवंबर को जर्मन की जगह संस्कृत अनिवार्य रूप से पढ़ाने का आदेश आने के बाद अगले ही दिन से जर्मन विषय की पढ़ाई बंद कर दी गई थी। शुक्रवार को केंद्रीय विद्यालयों से जर्मन शिक्षक भी निकाल दिए गए।

जेएलए के जर्मन शिक्षक जब स्कूल से निकाले गए तो बच्चे रो पड़े। बच्चों के साथ ही उनके अभिभावक भी बीच सत्र में संस्कृत पढ़ने के फरमान से परेशान हैं। बरेली में पांच केंद्रीय विद्यालय हैं, केवी जेआरसी, जेएलए, केवी एनईआर, केवी आईवीआरआई और केवी इफ्को आंवला।
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केवीएस की बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में हुए निर्णय के बाद ज्वॉइंट कमिश्नर की ओर से यह आदेश स्कूलों में जारी किया गया था। इसमें यह भी कहा गया था कि जरूरत पड़ी तो अभिभावकों और बच्चों की काउंसिलिंग भी की जा सकती है। कक्षा छह, सात के विद्यार्थियों को संस्कृत इस विषय के टीजीटी शिक्षक ही पढ़ाएंगे। अगर बच्चा संस्कृत की जगह पर कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा का चुनाव करेगा तो उन्हें पढ़ाने के लिए अनुबंधित शिक्षकों की नियुक्ति की जा सकती है।
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केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन की जगह संस्कृत

देश के कई केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा छह से आठ में तीसरी भाषा के तौर पर पढ़ाई जा रही जर्मन भाषा को हटाकर संस्कृत या फिर कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया है। खास बात यह है कि मंत्रालय ने शैक्षणिक सत्र के बीच में ही अपने इस फैसले को लागू करने का निर्देश केंद्रीय विद्यालय संगठन को दिया है। मंत्रालय के इस फैसले से देशभर के 504 केंद्रीय विद्यालयों के करीब 64 हजार छात्र प्रभावित होंगे।

जर्मन भाषा को हटाने के फैसले पर सफाई देते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है कि सरकार यह मंजूर नहीं कर सकती कि देश में तीसरी भाषा के तौर पर कोई विदेशी भाषा पढ़ाई जाए। ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले का उल्लंघन है। यह संविधान का भी उल्लंघन था।

उन्होंने कहा कि 2011 में केंद्रीय विद्यालय संगठन और जर्मनी के बीच हुए जिस समझौते के तहत स्कूलों में जर्मन भाषा पढ़ाई जा रही थी उसे आज तक मंत्रालय ने मंजूरी नहीं दी। आखिर इसे कैसे मंजूरी मिली, इसकी जांच के आदेश मंत्रालय ने दे दिए है। उन्होंने इस आरोप को गलत बताया कि सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दबाव में आकर ऐसे कदम उठा रही है।

जर्मनी के राजदूत ने विदेश मंत्रालय से इस संबंध में ऐतराज जताया है। केंद्रीय विद्यालयों का शैक्षणिक सत्र मार्च में खत्म होता है और यह फैसला हाल ही में स्मृति ईरानी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय विद्यालय संगठन की बैठक के दौरान 27 अक्तूबर को लिया गया। 10 नवंबर को सभी केंद्रीय विद्यालयों में सर्कुलर भेज दिया गया। इसके अनुसार जर्मन भाषा का अध्ययन कर रहे छात्रों को संस्कृत या अन्य आधुनिक भारतीय भाषा पढ़ने का विकल्प दिया जाएगा। छठी से आठवीं कक्षाओं के छात्र छात्राएं चाहें तो जर्मन भाषा का अध्ययन अतिरिक्त विषय या हॉबी के रूप में कर सकते हैं। मगर इसे अब तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाया नहीं जाएगा।

इस मामले को पिछले साल संस्कृत शिक्षक संघ ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। संगठन का आरोप था कि संस्कृत भाषा का अपमान करने के लिए ऐसा किया गया है। पिछली सरकार के समय तक मंत्रालय इस फैसले को सही ठहराता रहा लेकिन मोदी सरकार के आते ही मंत्रालय ने अपना स्टैंड बदलते हुए हाईकोर्ट को जानकारी दी है कि वह इस फैसले को बदलने जा रहा है।
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