एक तरफ भव्यता बिखेरती श्रीकृष्ण की जन्म भूमि है तो दूसरी ओर उदास और उपेक्षित खड़ा राधा का जन्मस्थल रावल, ये भेद ब्रजवासियों ने नहीं बल्कि पर्यटन और संस्कृति विभाग ने किया है। जिस ब्रज में श्री जी का स्थान श्याम सुंदर से भी ऊंचा है, जहां हर क्षण मुख पर राधा नाम होता है, वहां रावल की गुमनामी बहुत कचोटती है। किशोरी की नंसार और जन्म स्थल रावल गांव पर्यटन के नक्शे से गायब है। प्रशासनिक उपेक्षा की धूल फांकते इस गांव की महत्ता का भान अधिकांश लोगों को नहीं है। यही वजह है कि न यहां श्रद्धालु हैं और न राधा की रट।
कठिन डगर रावल की
लाडली जी के प्राचीन गर्भ गृह के दर्शन को भक्त आएं भी तो कैसे? दूर-दूर तक कोई संकेतक नहीं, सड़क के नाम पर जानलेवा गड्ढे हैं। राधाष्टमी से पहले संवाददाता ने राधिका रानी की जन्म भूमि रावल का रुख किया। गोकुल से करीब आठ किमी दूर रावल गांव की राह आसान नहीं थी। गोकुल बैराज से आगे बढ़ते ही सड़क गड्ढों में तब्दील हो गई। जैसे-तैसे गांव तक पहुंचे।
रावल में राधाष्टमी
विकास से कोसों दूर खड़े रावल के अंतिम छोर पर स्थित प्राचीन राधारानी जन्म स्थान मंदिर में राधाष्टमी की तैयारियां चल रही थीं। लाडली जी के प्राचीन गर्भ गृह को संवारा जा रहा था। शुक्रवार से मंदिर में राधाष्टमी का उत्सव छठी पूजन से प्रारंभ हो गया। 23 को राधाष्टमी की सुबह चार बजे गर्भ गृह में राधा जन्म के दर्शन होंगे। उसके बाद सवा कुंतल दूध से श्री जी का अभिषेक होगा। अष्टछाप कवि छीत स्वामी की बधाई 'राधा रावल प्रगट भई...' की गूंज भी होगी। राधाष्टमी पर यहां मेला लगता है।
मंदिर के पुजारी ललित मोहन कल्ला ने बताया कि यमुना की बाढ़ में मंदिर के प्राचीन बुर्ज ढह गए, बाद में हमने जीर्णोद्धार कराया। गर्भ गृह में विराजी राधा कृष्ण की मूर्तियां हजारों वर्ष पहले करील के पेड़ के नीचे स्वयं प्रगट हुई थीं। आज भी वह पेड़ गर्भ गृह के ऊपर है। पिछले पांच-छह सालों में हमने मंदिर के प्रचार-प्रसार में काफी काम किया है, लेकिन प्रशासन का कोई सहयोग नहीं है। बहुत कम श्रद्धालु यहां आते हैं।
डेढ़ बरस की उम्र में हुआ था पहला मिलन
ब्रज संस्कृति से जुड़ी कई पुस्तकों में राधा का जन्म स्थान रावल बताया गया है। संपादक गोपाल प्रसाद की पुस्तक ब्रज विभव में रावल का इतिहास वर्णित है। लेखक रामबाबू द्विवेदी ने लिखा है कि जिस समय आनंद कंद भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, उस समय नंद बाबा का निवास गोकुल में था और वृषभानु गोप का निवास गोकुल के पास यमुना के पूर्वी तट पर स्थित रावल नामक ग्राम में। उसी स्मृति में यहां मंदिर बनवाया गया। मंदिर का शिखर मराठों ने बनवाया। राधा रानी की मां कीर्ति रानी का पीहर भी रावल था।
कुछ मान्यताओं के अनुसार, राधा का जन्म श्रीकृष्ण से साढ़े ग्यारह महीने पूर्व रावल में हुआ था। कन्हैया के नंदोत्सव में बधाई देने के लिये वृषभानु व माता कीर्ति करीब एक बरस की श्री जी को लेकर गोकुल आए। तब तक राधा ने अपने नेत्र नहीं खोले थे। प्रिया प्रियतम का प्रथम मिलन यहां हुआ। इसी अवसर पर प्रिया जी ने अपने नेत्र खोलकर श्री कृष्ण के दर्शन किए।