आप पार्टी के नेता केजरीवाल के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत सादा खाना खाते हैं। कहा यही जता है कि उनकी थाली में दाल, थोड़ी सब्जी और कुछ चपाती रहती है। लेकिन जो लोग उनके साथ डिनर पार्टी में शामिल होंगे उन्हें मायूस होने की जरूरत नहीं है। आप उनके बीस हजार रुपए में केवल दाल-रोटी नहीं खिलाएगी। आखिर बीस हजार रुपए में तो पांच सितारा होटल का बेहतरीन जायके वाला खाना खाया जा सकता है, फिर दाल-रोटी बीस हजार की क्यों हो?
अब आप पार्टी अपने गेस्ट के लिए परोसे जाने वाले मैन्यू का जिक्र तो नहीं कर रही। लेकिन ऐसा भी नहीं होगा कि कांग्रेस और भाजपा उसके व्यंजनों की सूची पर लतीफे बनाए। आम लोगों की पार्टी कहने वालों के जरिए परोसे जाने वाले व्यंजनों पर बाहर चटकारे लिए जाएं। अब आप क्या खिलाए यह तो उसे सोचना है। पर उसकी डिनर डिप्लोमेसी यही है कि लोग बीस हजार रुपए दें और केजरीवालजी के साथ खाते खाते कुछ गुफ्तगू भी करें। इसी बहाने थोड़ा मेल-जोल भी। इस डिनर डिप्लोमेसी के जरिए लोगों को अपनी जेब से बीस हजार रुपए देने होंगे। आप पार्टी इसे अपने लिए चंदा मानती हैं। और चुनाव आयोग ने भी कह दिया कि उसे ऐसे चंदा उगाई से कोई हर्ज नहीं। हां, चंदे का इस्तेमाल कैसे हो, इस पर उसकी नजर रहेगी।
इस तरह की डिनर पार्टी हाइटेक शहर बंगलुरु में होगी। फिर धीरे-धीरे दूसरे शहरों में भी होगी। देश में ऐसे लोग हैं कि जो ऐसी पार्टियों के लिए बीस हजार रुपए खर्च कर सकते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह पब्लिक स्टेटस हो, कुछ लोगों की धारणा हो कि इसी बहाने आप को चंदा भी दें और केजरीवालजी के दर्शन भी कर लें। कुछ लोगों के लिए यह भी एक मजमा हो कि चलो जरा चल कर देखें क्या होता है डिनर पार्टी में। लेकिन आप पार्टी के लिए संतोष की बात यही है कि डिनर के टिकट बिक रहे हैं।
गुल की रोशनी में नहाई 'आप'
मिस इंडिया रही गुल पनाग चंडीगढ़ से चुनाव लड़ने जा रही हैं। 1999 में जब उन्होंने मिस इंडिया का खिताब जीता था तो मिस स्माइल भी उन्हें ही कहा गया। कोई यह सोच सकता है कि सौंदर्य और ग्लैमर्स की रोशनी में आप नहा गई हो और एक टिकट गुल पनाग के लिए निकल आया हो। लेकिन इसका मतलब गुल पनाग की जिंदगी का केवल एक ही पक्ष जानना होगा। उनकी जिंदगी में और भी कई करिश्में हैं।
एक सैनिक अधिकारी के बच्चों की तरह गुल पनाग ने भी कई स्कूल-कालेज बदले। शहर-शहर के 14 स्कूलों में वह पढ़ी। केंद्रीय विद्यालय से लेकर लारेंस कालेज तक। यही नहीं बीए आनर्स पंजाब विश्वविद्यालय से गणित से किया। सुंदर चेहरा और मोहक मुस्कान ही स्कूल-कालेज में उनकी शोहरत की वजह नहीं थी। वह डिबेट में भी अपने स्कूल के लिए खासे रजत स्वर्ण पदक जीत कर लाती थी। उसके डिवेट के मंच पर बोलते समय सभागार भरे रहते थे। इंटर यूनिवर्सिटी में भी उसने अपना परचन फैलाया है। फिर गुल पनाग को राजनीति में आना ही था।
कोई हर्ज नहीं कि आप के लिए वह सेलिब्रिटी वाला चेहरा हो। लेकिन आने वाले समय में वह धारदार भाषण भी करती हुई नजर आ सकती हैं। आप को यही तो चाहिए। फिलहाल सुंदर शहर में एक सुंदर चेहरा चुनाव मैदान में आया है। इधर गुल पनाग की मुस्कराहट है, उधर बताते हैं कि एक बड़ा कांग्रेसी नेता अपनी परंपरागत सीट छोड़ कर इस सीट के लिए मचल रहा है। उनकी विशेषता यह है कि वो कभी मुस्कराते ही नहीं। हमेशा चिढ़े से नजर आते हैं।
कांग्रेस से महान कौन
कांग्रेस के लिए महान शब्द पर एकाधिकार रहा है। कांग्रेस पार्टी महान, उसके नेता, नीतियां, कार्य़क्रम सब महान। मगर पहली बार कांग्रेसी नेता कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि उप्र में महान पार्टी से उनका समझौता हुआ है। समझौता क्या! महान पार्टी को तीन-चार सीटें दे दी जाएं तो गनीमत।
लेकिन अभी कांग्रेसी ठीक से समझा नहीं पा रहे हैं कि महान पार्टी दरअसल है कौन। उसे किन इलाकों में सीट दी जाएगी? कांग्रेस अगर महान पार्टी को साथ ले रही है तो सारा खेल जातीय आकड़ों का है। महान नाम से चलने वाली पार्टी में गैर यादव पिछड़ों और कुछ अति पिछड़ों का थोड़ा समर्थन है। लिहाजा कांग्रेस को यही फायदे का सौदा दिखा है।
इसलिए उसे महान पार्टी से कोई समझौता करने में हर्ज नहीं। अब देखना दिलचस्प होगा कि आप पार्टी को तीन-चार सीटें कहां से दी जाती है। वैसे भी कांग्रेस के पास उप्र में बांटने के लिए बहुत कुछ हैं। लेने वाले आगे तो आएं।
दूर रहेंगे अब अन्ना से
लोकसभा चुनाव प्रचार की शुरुआत में ही अन्ना हजारे तृणमूल कांग्रेस नेता ममता के साथ नहीं आए। रामलीला मैदान की कुर्सियां खाली रह गई। अन्ना को आना था, बिन्नी को भी आना था। मगर वहां केवल तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी थीं। अन्ना दिल्ली में थे मगर नहीं आए।
ममता को मायूसी मिलनी थी। कहां तो ममता को दिल्ली के प्रत्याशियों के नाम का ऐलान करना था, और कहां खाली खाली कुर्सियां। तृणमूल कांग्रेस को अन्नाजी का आशीर्वाद की अपेक्षा थी, मगर यह शुभ अवसर नहीं आया। अन्नाजी ने कहा कि तबियत ठीक न होने की वजह से नहीं जा सका। पर राजनीतिक पंडित उनकी गैरहाजिरी के कई अर्थ निकाल रहे हैं।
इस कशमकश में अन्नाजी से भविष्य में जुड़ सकने और उनसे सहयोग लेने की अपेक्षा करने वाले राजनीतिक दल अब अन्नाजी को लेकर संभल कर रहेंगे। उनके मिजाज का कोई भरोसा नही। अन्ना कब क्या कर जाएं और कह जाएं मुश्किल है। अब कोई यूं ही नहीं पुकारेगा, अन्ना हमारे हैं।