मुंबई के गुनहगार पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब की फांसी से संसद सत्र के दौरान रिटेल में एफडीआई और अविश्वास प्रस्ताव को लेकर गरमाई सियासत का तापमान बुधवार को थम सा गया।
मंगलवार तक खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास और वोटिंग का प्रस्ताव सुर्खियों में छाया हुआ था, मगर सुबह सुबह सूली पर चढ़ाए गए कसाब से सियासी फिजां भी एकदम बदल गई। भ्रष्टाचार और महंगाई पर सरकार की बदनामी यकायक तारीफों में बदल गई। हालांकि सरकार ने फांसी में किसी तरह के सियासी मकसद को साधने की बात को नकार दिया है।
संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के ठीक एक दिन पहले कसाब को फांसी देने के फैसले पर अमल होने से सियासी बहस की दिशा ही बदल दी है। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों से लेकर टीवी चैनलों पर कसाब की फांसी छायी हुई है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सरकार की तारीफों के पुल बांधे रहे हैं।
सरकार और कांग्रेस के रणनीतिकार भी सियासी मोर्चेबंदी में जुट गए हैं। मगर यह पूछे जाने पर कि क्या संप्रग सरकार कसाब की फांसी के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। तो सरकार एकदम इस सवाल को खारिज कर रही है। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस पर सफाई दी कि फायदा उठाने का सवाल ही नहीं है। यह फैसला पहले ही हो चुका था।
मालूम हो कि भ्रष्टाचार और महंगाई के मसले पर यूपीए सरकार चौतरफा घिरी हुई है। एफडीआई को लेकर विपक्ष एकजुट होने में लगा है। एफडीआई पर वोटिंग कराकर विपक्ष सरकार को बैकफुट पर लाने की कोशिश में है। वोटिंग के डर से सरकार के पसीने छूट रहे हैं।
लिहाजा, अजमल कसाब की फांसी से बदली फिजां का फायदा यूपीए सरकार को हो सकता है। मगर दूसरी तरफ विपक्ष भी बदली फिजां को भांपते हुए यूपीए सरकार के संकट को बढ़ाने में जुट गया है। बृहस्पतिवार से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष एफडीआई के साथ अफजल गुरु की फांसी की मांग को लेकर सरकार पर हमला करने की तैयारी कर चुका है।