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क्या इस बार अपने इस दुश्मन से जीत पाएंगे कल्याण?

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82 साल के कल्याण सिंह इस बार चुनाव मैदान में खड़े तो नहीं हुए हैं अलबत्ता बीजेपी के लिए प्रचार जरूर कर रहे हैं। उनके बेटे राजवीर सिंह एटा से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
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राजवीर सिंह लगातार दो बार विधानसभा चुनाव हारे और कल्याण सिंह ने पिछले दो चुनावों में विजय पताका फहराई है। लेकिन इस बार कल्याण मैदान में नहीं हैं। उन्होंने बेटे के लिए अपनी सीट कुर्बान कर दी। लेकिन क्यों?

कल्याण को क्यों छोड़ना पड़ा बुलंदशहर? क्यों और किसने दो बार हराया उनके बेटे को? इन सभी सवालों का जवाब जानें आगे की स्लाइडों में।

चेले ने दिया कल्याण को धोखा?

बुलंदशहर सीट को कल्याण सिंह का गढ़ माना जाता रहा है। 2004 में ओबीसी का बड़ा चेहरा और सूबे के पूर्व सीएम कल्याण सिंह बीजेपी के टिकट पर बुलंदशहर से चुनाव जीते थे। इसके बाद बुलंदशहर सीट को अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित कर दिया गया।

2009 में वे एक ऐसे उम्मीदवार को लेकर सामने आए जिसका कभी नाम भी राजनीति में नहीं सुना गया था- कमलेश वाल्मिकि। इस बार कल्याण सपा में थे। अब 2014 में वे एक बार फिर बीजेपी के झंडे तले एक नए उम्मीदवार को लेकर आए हैं- भोला सिंह। खास बात ये कि कल्याण ने जिस कमलेश को सांसद बनवाया वो कल्याण के पीछे बीजेपी में नहीं गए, सपा में ही बने रहे।

इस वफादारी का उनको ईनाम मिला और वो एक बार फिर सपा के टिकट पर मैदान में हैं। उनको टक्कर दे रहे हैं बीजेपी और कल्याण के उम्मीदवार भोला सिंह।

बेटे से कल्याण का बेइंतहा मोह

2012 के विधानसभा चुनावों में कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह डिबाई विधानसभा सीट से चुनाव हार गए थे। उनको हराया था समाजवादी पार्टी के बाहुबली नेता गुड्डू पंडित ने।

2007 के चुनावों में भी गुड्डू पंडित ने राजवीर सिंह को डिबाई से पराजित किया था। उस वक्त गुड्डू बहुजन समाज पार्टी में थे। कल्याण ने आरोप लगाया था कि बीजेपी नेता अशोक प्रधान ने गुड्डू की मदद की है और इसी नाराजगी में उन्होंने पार्टी छोड़ी थी।

इस बार उन्होंने अपने बेटे के लिए अपनी सीट खाली कर दी है। एटा संसदीय सीट से राजवीर चुनाव मैदान में हैं।

गुड्डू पंडित और कल्याण की अदावत

गुड्डू ने दो बार कल्याण के बेटे को विधानसभा चुनाव में हराया। कल्याण ने 2009 में कमलेश को जिता कर ये साबित किया था कि वे अभी चुके नहीं है और किसी को भी चुनाव जिता देने का माद्दा रखते हैं।

कल्याण अपने बेटे राजवीर को दो बार हारने से नहीं बचा पाए। ऐसे में ये माना जाने लगा कि कल्याण की राजनीति अब खत्म हो चुकी है लेकिन ऐसे में कल्याण ने कमलेश को सांसद बनवा अपना वजूद कायम रखा।

लेकिन इस बार कमलेश के पीछे खड़े हैं गुड्डू पंडित और भोला सिंह के पीछे खड़े हैं खुद कल्याण सिंह। चुनाव बेशक भोला और कमलेश लड़ रहे हों लेकिन लड़ाई है गुड्डू और कल्याण की।

कल्याण ने राजनीति के रुख को समझा और मोदी की कथित लहर के सहारे बेटे की नाव पार लगाने की सोची। उन्होंने एटा सीट अपने बेटे के लिए खाली कर दी और विधानसभा चुनाव में दो बार के पराजित हुए उनके बेटे अब सांसद का चुनाव लड़ रहे हैं।
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गुड्डू और कल्याण फिर आमने सामने

कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह को लगातार दो बार चुनाव मैदान में पराजित करने वाले डिबाई के विधायक गुड्डू पंडित, कमलेश के खास सिपहसालार बने हुए हैं।

कल्याण सिंह यदि भोला सिंह के पीछे खड़े हैं तो वहीं गुड्डू पंडित कमलेश के पीछे खड़े हैं। टक्कर यदि भोला और कमलेश की है तो टक्कर कल्याण और गुड्डू की भी है। इस टक्कर में कौन जीतेगा?

या फिर इस टक्कर में कोई तीसरा ही बाजी मार लेगा? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब तभी मिलेगा जब चुनावों के परिणाम सामने आएंगे। फिलहाल तो पूरा बुलंदशहर दिल थाम कर इस टक्कर को देख रहा है और इस चुनावी मौसम में कयास लगा रहा है।
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