अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से ‘जनपक्षीय पत्रकारिता की चुनौतियां एवं पहाड़ के गुमनाम नायकों की महागाथा’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन इंडिया इंटरनेशल सेंटर में किया गया।
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संगोष्ठी में जानेमाने पत्रकार मार्क टूली ने कहा कि सामाजिक पत्रकारिता और आर्थिक पत्रकारिता जैसे शब्दों से उन्हें आश्चर्य होता है। पत्रकारिता को जनपक्षीय कहना भी उन्हें आर्श्य में डालता है। पत्रकारिता दरअसल जन के लिए ही होती है। आर्थिक पत्रकारिता भी दरअसल आम आदमी पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों के बारे में की जाती है।
उन्होंने कहा कि किसानों की समस्या मीडिया में आ रही है,लेकिन आदिवासियों के मुद्दे अब भी पत्रकारिता के दायरे से बाहर हैं। उन्होंने कहा कि भूमि सुधार बिल के बारे में बातचीत करते हुए भी आदिवासियों के मुद्दों पर चर्चा नहीं की जा रही है। भारत में पुनर्स्थापन के प्रयास कभी ईमानदारी से नहीं किए गए, भूमिअधिग्रहण के सबसे बड़े शिकार आदिवासी होंगे, लेकिन उनके बारे में बात ही नहीं की जा रही है। मार्क ने कहा कि अखबार में एडवर्टइजमेंट मैनेजर की भूमिका बढ़ गई है और पत्रकारिता इन्फोटेनमेंट में तब्दील हो चुकी है।
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केंद्रीय मंत्री श्रीपाद नाईक ने कहा कि उन्होंने कहा कि समाज और समुदाय के विकास में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहाकि मीडिया का मूल दायित्व सरकार और समाज पर पैनी नजर बनाए रखना और उन्हें अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना है। श्रीपाद नाईक ने कहा कि जब समाज में चुनौती बढ़ती है, मीडिया की भूमिका भी बढ़ जाती है।
अखबार 20 पेज से ज्यादा न हों: गोविंदाचार्य
राजनीतिक चिंतक केएन गोविंदाचार्य ने कहा कि पत्रकारिता जनभावना की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि जन के परिष्कार का भी दायित्व उस पर है। उन्होंने कहा कि जो खुद बचाव न कर सके, उनके बचाव के लिए ‘स्टेट’ का गठन हुआ। यदि मीडिया ‘फोर्थ स्टेट’ है तो वह भी उनका बचाव करे, जो खुद का बचाव नहीं कर सकते। समाज के अंतिम आदमी के सरोकारों के प्रति भी उसका दायित्व है।
उन्होंने कहा स्थानीय पत्रकार भविष्य की ताकत हो सकते हैं, इसपर काम किए जाने की आवश्यकता है। शिक्षा, स्वस्थ्य और मीडिया का धनीकरण हो गया है, इससे जनीकरण से ही निपटा जा सकता है। अंतिम व्यक्ति के हक के लिए अधिक संवेदनशील और सचेत होना वक्त का तकाजा है।
गोविंदाचार्य ने कहा कि कागजों के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं, ऐसे में क्या ये मुहिम नहीं चलाई जा सकती कि अखबार 20 पेज से ज्यादा न हों। अखबारों में 50 फीसदी से ज्यादा विज्ञापन न हो। जनपक्षीय पत्रकारिता का मंत्र यही हो सकता है कि वे अंतिम व्यक्ति की बात को बोले, जो जहां है, वो वहीं से बोले, जो बोले सही बोले।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, हर पत्रकारिता जनपक्षीय नहीं है, जनपक्षीय पत्रकारिता का पहला तकाजा सच्चाई है। स्थितियों का 360 डिग्री पर अवलोकन किया जाए, उसके बाद ही लिखा जाए। लोग आज भी लिखे हुए शब्दों पर भरोसा करते हैं।
उन्होंने कहा कि टीवी की बहसों में दो व्यक्तियों में झगड़ा लगाना एंकर की कुशलता मानी जाने लगी है। जो समाचार नहीं है, उसे समाचार बना देना, वह जनपक्षीय पत्रकारिता नहीं है। स्रोत की जांच न करना भी जनपक्षीय पत्रकारिता नहीं है। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि खबरों की ट्रीविलाइज किया जा रहा, यह भी जनपक्षीय पत्रकारिता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि खबरों को परिप्रेक्ष्य और तारतम्य से परे दिखाना जनपक्षीय पत्रकारिता नहीं हो सकती।
संगोष्ठी में अमर उजाला फाउंडेशन की राष्ट्रीय मीडिया फेलोशिप के तहत प्रकाशित अध्ययन त्रयी ‘समय के सवाल’ का विमोचन भी किया गया। किताब में विवेक मिश्र, सुरेंद्र बंसल और अंतिमा सिंह के शोध प्रकाशित किए गए। विवेक मिश्र ने घाघरा की तबाही, सुरेंद्र बांसल ने पंजाब की शिक्षा में नवाचार, अंतिमा सिंह ने खाप पंचायतों पर शोध किया था।
इस अवसर पर प्रेम और शैलेंद्र की किताब ‘है गौ’ का भी विमोचन किया था। प्रेम और शैलेंद्र ने 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ की तबाही के बाद के पुनर्स्थापन कार्यां का लेखाजोखा पेश किया है।