फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

संसद में सपा के नक्शेकदम पर चली जेडीयू

Thu, 29 Aug 2013 01:01 PM IST
हिमांशु मिश्र/नई दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
भाजपा से 17 साल पुराना संबंध तोड़ने के बाद जदयू भी सपा की राह पर है।
विज्ञापन


संसद के मानसून सत्र में जदयू ने भी सपा की तरह ही बयान और चर्चा में विरोध और मतदान में सरकार का सहयोग करने की राह चुन ली है।

खाद्य सुरक्षा विधेयक के बाद जदयू भूमि अधिग्रहण, पेंशन और बीमा सहित अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए भी जदयू, सपा-बसपा की तरह सरकार को परोक्ष और प्रत्यक्ष समर्थन देने की तैयारी कर ली है।

सारा कुछ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इशारे पर हो रहा है। नीतीश सियासी समर्थन के बदले राज्य को अधिक से अधिक केंद्रीय मदद देने की शर्त पर मान लिए जाने के बाद ही राजी हुए हैं।
विज्ञापन


हालांकि इस रणनीति पर पहले पार्टी के कुछ नेताओं को आपत्ति थी, मगर अब ऐसा लगता है कि पूरी की पूरी पार्टी नीतीश की रणनीति के साथ खड़ी हो गई है।

उल्लेखनीय है कि भाजपा का साथ रहते जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने खाद्य सुरक्षा विधेयक के कुछ प्रावधानों पर कई बार कड़ी आपत्ति जताई थी। मगर भाजपा का साथ छूटने के साथ ही जदयू को अपनी रणनीति बदलनी पड़ गई।

बीते सोमवार को खाद्य सुरक्षा विधेयक के कई प्रावधानों का जदयू ने सपा की तरह तीखा विरोध तो जताया, लेकिन मतदान के दौरान ऐसा नहीं दिखा। यही नहीं पार्टी ने भूमि अधिग्रहण समेत कई अन्य अहम विधेयकों को पारित कराने में भी सरकार को सहयोग करने का आश्वासन दिया है।

हालांकि इन विधेयकों पर चर्चा के दौरान भी जदयू सपा की तरह ही सरकार की तीखी आलोचना से नहीं चूकेगी। हालांकि राज्य सभा में अल्पमत में होने के कारण जदयू के रूप में नया साथी मिलने से सरकार के रणनीतिकार खुश हैं।

दरअसल भाजपा से साथ छूटने के बाद चुनावी गठबंधन या सीट पर समझौता के मामले में फिलहाल जदयू और कांग्रेस एक दूसरे को तौल रहे हैं। कांग्रेस का एक धड़ा जदयू से स्थाई संबंध बनाने के पक्ष में है तो दूसरा धड़ा उत्तर प्रदेश की तरह ही राज्य में जदयू और राजद को एक साथ साधे रखने की रणनीति पर काम करना चाहता है।

इस धड़े को लगता है कि जिस तरह सपा-बसपा दोनों को सालों से एक साथ साधा गया, वैसी ही स्थिति बिहार में भी पैदा की जा सकती है। नीतीश को लगता है कि अगर चुनाव में साथ आने पर बात नहीं भी बनी तब भी फिलहाल सरकार का सहयोग कर पार्टी अधिक से अधिक केंद्रीय मदद हासिल कर सकती है।
विज्ञापन


इससे नीतीश बिहार में विकास का काम ठप न होने का लगातार संकेत देते रह सकते हैं। यही कारण है कि सत्र से ठीक पहले नीतीश ने सरकार को हर मोर्चे पर साथ देने का फैसला किया। हालांकि इस दौरान पार्टी अध्यक्ष शरद यादव सहित कुछ सांसद नीतीश के  इस फैसले से सहमत नहीं थे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें