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मौके कम, लेकिन भूख बहुत

Wed, 14 Aug 2013 08:17 PM IST
जयदीप साहनी
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सभ्यता के रूप में हम चाहे जितने पुराने हों, पर लोकतंत्र के रूप में अभी हमारी उम्र कच्ची है। जाति प्रथा, सामंती सोच, संस्कृति या मर्यादा के नाम पर पाखंड हमारी सभ्यता के कोढ़ हैं।
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जब तक ये पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, हम तरक्की नहीं कर सकेंगे। एक तरफ हम आधुनिक होने का दंभ भरते हैं, दूसरी तरफ पाखंड छोड़े नहीं जा रहे हैं। हम रेस्तराओं से लड़कियों को निकाल कर उन्हें पीटते हैं, उनके कपड़े फाड़ते हैं और भारत माता की जय के नारे लगाते हैं, यह हमारा असली चेहरा है।

लेकिन मुझे नई पीढ़ी से उम्मीद है, जो चीजों को बदलने की तरफ बढ़ चुकी है। उसके पास जात-पात के लिए समय नहीं है, उसके पास सामंती सोच को पालने-पोसने का वक्त नहीं है। वह मन की धुन पर जीती है। भ्रष्टाचार और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ जो लड़ाई देश में छिड़ी है, नई पीढ़ी उसका अभिन्न हिस्सा बन कर उभरी है। उसमें आक्रोश है।
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आज लोग सरकारों से सवाल पूछने लगे हैं, वे सड़कों पर उतरने लगे हैं। हमें कभी-कभी लगता है कि क्या यह सही तरीका है? क्या सड़कों पर कानून बन सकते हैं? लेकिन ये लोकतंत्र की परिपक्वता के दौर की शुरुआती तकलीफें हैं, जैसे बच्चे को दांत निकलते वक्त होती हैं। लेकिन ये अच्छे संकेत हैं।

अब सरकारों को समझ आने लगा है कि पहले जैसे काम नहीं चल सकता। पहले उनके मन में सामंती सोच के खूंटे गड़े थे, उन्हें किसी का कोई डर नहीं था। उन्हें लगता था कि हम चुनाव जीत गए, संसद में पहुंच गए, हम देख लेंगे कि सबके लिए क्या अच्छा है। जवाब तो पांच साल बाद देना होगा। अब ऐसा नहीं है।

वे जानते हैं कि बीच में भी जवाब मांगा जा सकता है। अब अच्छे नेताओं और अच्छे अफसरों को बढ़ावा देने का समय है। बड़े जनांदोलनों के साथ अब ऐसे नेता सामने आएंगे, जिनकी स्वीकृति सबमें होगी।

पिछले पंद्रह-सत्तरह सालों में चीजें बहुत तेजी से बदली हैं। दूरसंचार क्रांति हुई, केबल आया, सैटलाइट क्रांति हुई। इन्होंने समाज का चेहरा और चरित्र बदल दिया। पर दुखद पक्ष यह है कि आदमी सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है। बड़े घोटाले इसी का नतीजा हैं। सब अपने घरों में पानी की टंकियां और पंप लगाकर बैठे हैं।

हमारी फीलिंग ऑफ कम्युनिटी, वन नेशन-वन पीपुल की धारणा खंडित हो रही है। बड़े शहरों ने कस्बों-गांवों से दूरियां बना ली हैं। जब हमारी क्रिकेट टीम जीतती है या आतंकी हमला होता है, तब तो हम एक हो जाते हैं, लेकिन जब खनन के लिए या बांध बनाने के लिए गांव के गांव उजाड़ दिए जाते हैं, तो हमारे भीतर कोई हलचल नहीं होती।

मुझे लगता है कि देश के मध्यम वर्ग की सोच ज्यादा आत्मकेंद्रित हुई है। उसकी आर्थिक संपन्नता बढ़ी है, वह ग्लोबली ज्यादा कनेक्ट हुआ है, पर अपने में ही सिमटता जा रहा है। वह देश के भीतर एक नए देश की तरह उभर रहा है। यह अच्छा संकेत नहीं है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम के ज्यादातर नेता इसी मध्यम वर्ग से आए थे लेकिन आज के मध्यम वर्ग के लिए मॉल्स, मल्टीप्लेक्स, चुनिंदा ब्रांड्स, गिनती के टीवी चैनल और कुछेक फिल्मी सितारे ही उसका इंडिया हैं।

फिर भी मैं निराश नहीं हूं। गुलजार साहब ने मेरी फिल्म ‘बंटी और बबली’ के लिए एक गीत लिखा था- छोटे छोटे शहरों से, खाली भोर दुपहरों से... हम तो झोला उठा के चले। ये उसी नौजवान पीढ़ी का गीत है, जो अपने कस्बों-गांवों में असंतुष्ट है। जिसकी उम्मीदें और सपने रोशनी की रफ्तार से आकाश की ऊंचाई छू रहे हैं और जिसके पास मौके भारतीय रेल की गति से आ रहे हैं। ऐसे में यह नई पौध जहां है, वहां से निकल रही है। ज्यादा दिन नहीं, पांच साल रुकिए। जब घर-घर इंटरनेट पहुंच जाएगा, तब देखिएगा। आज उनके पास मौके कम हैं, लेकिन भूख बहुत है। ये निकलेंगे वहां से और आपको गर्व करने के मौके देंगे।

आज हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जो अपनी कमियां मानने को तैयार नहीं है। कोई अगर कमियां बताता भी है, तो हम झंडा उठाकर मुंह छिपा लेते हैं। कोई आत्मा में झांकने को कहता है तो भारत माता की जय कहकर खड़े हो जाते हैं। आज हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसका कोई सटीक सिनेमाई चित्रण हो सकता है, तो राग दरबारी। पाखंडी समाज में आप राग दरबारी ही बना सकते हैं।
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(जयदीप 'चक दे इंडिया' और 'खोसला का घोंसला' जैसी फिल्मों के लेखक हैं।)
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