भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली की कानूनी सलाह के चलते ही एक अन्य भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी का करीब 70 लाख रुपये बकाया वेतन लटका हुआ है।
आईआईटी दिल्ली में पढ़ाने वाले स्वामी 1972 से 1991 के बीच अपने बकाया वेतन की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। मगर 1993 में जेटली ने बतौर वकील जिन शर्तों को जायज ठहराया था, उन्हीं को आधार बनाकर आईआईटी प्रशासन ने स्वामी को भुगतान नहीं किया।
मानव संसाधन मंत्रालय पर आरोप है कि इस मांग को ठुकराने की वजह से आईआईटी दिल्ली के निदेशक एस शेवगांवकर को इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि अब न सिर्फ आईआईटी प्रशासन बल्कि मानव संसाधन मंत्रालय भी जेटली की सलाह को सही मान रहे हैं।
स्वामी कर रहे थे बकाया वेतन की मांग
मंत्रालय अब आईआईटी प्रशासन के रुख को जायज ठहरा रहा है। सूत्रों का कहना है कि पूर्व फैकल्टी स्वामी के मामले में उच्च शिक्षा मामलों के सचिव सत्यनारायण मोहंती खुद जेटली की कानूनी सलाह को ठीक मान रहे हैं।
कानूनी सलाह में सरकारी सेवा के प्रावधानों के मौलिक नियम 54 ए का बाकायदा हवाला दिया गया था।
इसी नियम को आधार बनाते हुए जेटली ने राय दी थी कि जब तक स्वामी बर्खास्तगी के दौरान कमाई गई अतिरिक्त आय का स्रोत और संबंधित प्रमाण पत्र नहीं देते, तब तक उनको बकाया भुगतान नहीं देना चाहिए। आईआईटी दिल्ली ने तब जेटली से बतौर वकील कानूनी सलाह मांगी थी।
आईआईटी प्रशासन का तर्क है कि जेटली की इसी कानूनी राय के आधार पर ही स्वामी को भुगतान नहीं दिया गया है क्योंकि उन्होंने (स्वामी) अपनी अतिरिक्त आय के स्रोतों का ब्योरा और प्रमाणपत्र नहीं दिया था।
जेटली ने दिए थे ये तर्क
जेटली ने 19 मार्च, 1993 को आईआईटी प्रशासन को कानूनी सलाह दी थी कि स्वामी को बकाया वेतन का भुगतान तब तक नहीं मिलना चाहिए, जब तक वह अपने निष्कासन के दौरान उनको हुई आय का प्रमाणपत्र आईआईटी प्रशासन को नहीं देते हैं।
कानूनी सलाह में सरकारी सेवा के प्रावधानों के मौलिक नियम 54 ए का बाकायदा हवाला दिया गया था। इस नियम में कहा गया था कि किसी भी सरकारी अधिकारी को उसकी बर्खास्तगी के समय का बकाया वेतन दिया जाता है, तो उस रकम में से बर्खास्तगी के दौरान उस कर्मचारी की ओर से कमाई गई आय को घटाने के बाद ही कुल रकम देनी चाहिए।
मंत्रालय ने भी बदला रुख
माना जा रहा है कि भुगतान नहीं करने के चलते ही मानव संसाधन मंत्रालय ने आईआईटी दिल्ली के निदेशक एस शेवगांवकर पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया था। मगर अब खुद मंत्रालय ही शेवगांवकर के समर्थन में जेटली की कानूनी सलाह का समर्थन कर रहा है।