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धर्म और गणतंत्र के बीच फ्रांस में इस्लामोफोबिया

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बुधवार दोपहर को शार्ली एबदो समाचार पत्र पर हमले की खबर आने के कुछ घंटों बाद ही एक स्विमिंग प्रैक्टिस में हिस्सा ले रही अपनी बेटी को लेने गई हिजाब पहने दो बेटियों की मां के चेहरे पर भय साफ देखा जा सकता था। एक अन्य मां चीखते हुए सुनी गई कि मुसलमानों को फ्रांस में सभी व्यवस्थागत सुविधाएं मिलीं लेकिन ये लोग अब हमें ही मार रहे हैं।
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उसकी इस बात को सुनकर हिजाब पहने मां को डर लगा क्योंकि सभी जानते थे कि वह एक मुसलमान है। उसका यह डर इसलिए भी था क्योंकि इस एक घटना से पूरी मुस्लिम आबादी को आतंक फैलाने वाला माना जा रहा है। इसी तरह फाइनेंस के छात्र 22 वर्षीय राशिद अब्दुल रहमान भी इस घटना के बाद स्वयं को इससे जोड़े जाने पर चिंतित था।

फ्रांस में आतंकी हमले वाले ही दिन फ्रांसीसी लेखक मिशेल उलेबेक के उपन्यास के बाजार में आने पर बहस छिड़ गई है, जिसमें कहा गया है कि उग्र दक्षिणपंथी मारीन ले पेन को रोकने के लिए एक मुसलमान को फ्रांस का राष्ट्रपति चुना गया।
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आतंकी हमला दक्षिणपंथी ताकतों को ऊर्जा देने का काम

बहस को ठंडा करने के लिए फ्रांसीसी राष्ट्रपति ओलांद को आगे आकर कहना पड़ा कि वह खुद किताब पढ़ेंगे लेकिन हम परेशान माहौल में दिमाग नहीं खोएंगे। उन्हें कहना पड़ा कि हमें अपने डर को अपने ऊपर कब्जा करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। ओलांद के इस बयान को दक्षिणपंथी चेतावनी देने वाला बताते हुए आग में घी डालने वाला बता रहे हैं।

ये दोनों घटनाएं महज एक संयोग हैं या ऐसी कोई पूर्व योजना थी, ऐसा इसलिए क्योंकि इस घटना के बाद दक्षिणपंथी ताकतें इस्लाम के प्रति एक भय के माहौल को पुष्ट करने में जुट गई हैं। इस डर के चलते मुसलमानों में भी असुरक्षा का बोध होने लगा है। इसी माहौल को इस्लामोफोबिया कहकर पुकारा जा रहा है।
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1962 से जारी है दोनों के बीच संघर्ष

दरअसल फ्रांस में विभिन्न मुस्लिम देशों के करीब 50 लाख लोग रहते हैं, जिन्हें लेकर फ्रांसीसियों को लगता है कि ये धर्मनिरपेक्ष देश की राजनीति, कानूनी और धार्मिक छवि को चोट पहुंचा सकते हैं।

जबकि सीरिया और इराक में आईएस की हरकतें नेशनल फ्रंट की दक्षिणपंथी विचारधारा को और बलवती कर रही है। ऐसे में शार्ली एबदो पर आतंकी हमला फ्रांस की दक्षिणपंथी ताकतों को ऊर्जा देने का काम कर रहा है।

1962 से जारी है दोनों के बीच संघर्ष
फ्रांस में मुसलमानों के खिलाफ यह गुस्सा 1962 से चला आ रहा है। 1830 में फ्रांस द्वारा अल्जीरिया को जीतकर उसे 130 साल तक अपना उपनिवेश बनाए रखा, लेकिन दोनों तरफ से हजारों लोगों के खून खराबे के बाद अल्जीरिया को आजाद करना पड़ा, जिसे फ्रांसीसी अभी तक सहज भाव से नहीं ले पाए हैं।

1990 के दशक में अल्जीरिया के गृहयुद्ध में जिहादियों ने फ्रांस में भी जानलेवा हमले किए थे और तब एसओएस नस्लवाद संगठन खड़ा हुआ था जिसके चलते अप्रवासियों पर बहस छिड़ गई। 2005 में भी कई शहरों में युवा अप्रवासी मुसलमानों ने हिंसक प्रदर्शन किए।
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