आतंकी घटनाओं में शामिल लोगों पर से मुकदमा उठाने की सरकार की कवायद पर हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ‘यह कौन तय करेगा कि आतंकी कौन है। जब मामला कोर्ट में है तो अदालत को तय करने दीजिए। सरकार खुद कैसे तय कर सकती है कि कौन आतंकवादी है।
आतंकियों पर से मुकदमा हटाने की पहल कर क्या सरकार आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है। आज आप आतंकवादियों को छोड़ देंगे, कल उन्हें पद्यभूषण देंगे।’ संकट मोचन मंदिर, कैंट स्टेशन सहित वाराणसी के कई स्थानों पर बम ब्लास्ट, रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर आतंकी हमला जैसी वारदातों में शामिल लोगों पर से केस उठाने की कवायद को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान जस्टिस आरके अग्रवाल और आरएसआर मौर्या की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की। इस मामले को लेकर वाराणसी के नित्यानंद चौबे और सामाजिक कार्यकर्ता राकेश न्यायिक ने जनहित याचिका दाखिल की है।
याचिका पर बहस कर रहे अधिवक्ता शशिशंकर त्रिपाठी का कहना था कि सात मार्च 2006 को वाराणसी के संकट मोचन मंदिर, कैंट स्टेशन, लंका और दशाश्वमेघ घाट पर सीरियल बम ब्लास्ट हुआ था। इसमें शामिल रहे आतंकी वलीउल्ला और शमीम पर से सरकार मुकदमा वापस लेने की तैयारी कर रही है। जबकि वलीउल्ला को पुलिस ने फूलपुर इलाहाबाद से गिरफ्तार किया था। उसने ब्लास्ट में अपना हाथ होने की बात भी स्वीकार की थी। उसकी निशानदेही पर कई बरामदगियां की गई हैं। प्रदेश सरकार ने अभियोजन अधिकारियों से मुकदमा वापसी के संबंध में रिपोर्ट मांगी है।
इससे पहले रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में शामिल रहे लोगों पर मुकदमा उठाने के संबंध में रिपोर्ट मांगी गई है। याचिका में मांग की गई थी कि प्रदेश सरकार को 31 अक्टूबर 2012 को अभियोजन वापसी का आदेश वापस लेने का निर्देश दिया जाए। खंडपीठ ने सरकार से इस बावत अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। याचिका पर अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी। इसी प्रकार से रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर आतंकवादी हमले के मामले में दाखिल जनहित याचिका पर भी कोर्ट ने सरकार को अपना पक्ष बताने का निर्देश दिया है। इस याचिका पर 29 नवंबर को सुनवाई होगी।