शुक्रवार का दिन सियासत से जुड़े दो बड़े घटनाक्रम लेकर आया। दोनों चुनाव सुधारों से जुड़े थे। एक अदालत के दरवाजे से निकला और दूजा कांग्रेस 'युवराज' राहुल गांधी की तमतमाई बातों से।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में मतदाताओं को राइट टू रिजेक्ट दिया ही था कि इस बात पर चर्चा शुरू हो गई कि दागी नेताओं के खिलाफ शीर्ष अदालत के फैसले पर सरकार ने अध्यादेश का जो हथियार चला, कहीं मतदाताओं के नए अधिकार पर भी ऐसी ही कोई तलवार न चला दी जाए।
लेकिन तभी कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कुछ ऐसा कर दिया, जिससे मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार और अध्यादेश के हथियार, दोनों की हवा निकल गई।
राहुल गांधी जब संवाददाताओं से मुखातिब हुए, तो उनका चेहरा लाल था। उन्होंने गुस्से में कुर्ते की बांह चढ़ाई, तो फिर लगा कि आज भी वह भाजपा और उसके पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेंगे।
मनमोहन के खिलाफ क्यों उगली आग?
लेकिन जो हुआ, उसका अंदाजा किसी ने नहीं लगाया होगा। उन्होंने बोलना शुरू किया, तो आज अपनी ही सरकार के खिलाफ आग उगली। और वह भी बिना किसी लाग-लपेट के। उन्होंने मनमोहन सरकार को कटघरे में खड़ा किया और वह भी बिना किसी बहाने के।
राहुल ने कहा, "मुझे नहीं पता कि इस विषय में विपक्ष क्या बोल रहा है, लेकिन जहां तक मेरा सवाल है तो मेरा मानना है कि दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को फाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए। सरकार का फैसला गलत है।"
उन्होंने कहा, "जब तक हम दागियों को बचाना बंद नहीं करते, तब तक भ्रष्टाचार पर काबू नहीं पाया जा सकता।" जाहिर है, यह अध्यादेश यूपीए सरकार के लिए गले की फांस बन गया है।
अध्यादेश पर घिरी सरकार
राहुल से पहले विपक्षी दल भाजपा, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और यहां तक कि कांग्रेस के कई नेता भी इस अध्यादेश के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। अब सवाल उठता है कि राहुल ने एंग्री यंगमैन स्टाइल में मनमोहन सरकार को निशाने पर लिया क्यों?
सरकार की कमान भले मनमोहन सिंह के हाथों में हैं, लेकिन क्या इस बात पर भरोसा किया जा सकता है कि दागी नेताओं से जुड़े अध्यादेश के बारे में कांग्रेसी नेताओं या राहुल गांधी को पहले से जानकारी नहीं रही होगी?
सवाल यह भी है कि राहुल ने इतनी कड़ी प्रतिक्रिया देने और इतना गुस्सा दिखाने के लिए इतना इंतजार क्यों किया? क्या यह सब चुनावी ड्रामा है? और चुनाव से पहले कांग्रेस, खुद को और अपने सबसे बड़े नेता को मौजूदा सरकार और उसकी नाकामियों से अलग दिखाना चाहती है?
इस बीच ये भी खबर है कि राहुल गांधी के इस रुख के बाद सरकार इस अध्यादेश को वापस भी ले सकती है। और इसका सारा श्रेय राहुल गांधी को देकर पार्टी उन्हें आम चुनावों में एक हीरो के तौर पर पेश कर सकेगी।
'युवराज का चुनावी ड्रामा'
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो कुछ ऐसे ही संकेत मिलते हैं। जानकारों का मानना है कि राहुल ने मीडिया के सामने जो भड़ास निकाली, उसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी।
उनका कहना है कि कांग्रेस चुनावी ड्रामा खेल रही है और राहुल ने सिर्फ मंच का इस्तेमाल किया। दरअसल कांग्रेस, मनमोहन सरकार से अलग दिखना चाहती है। और राहुल मौजूदा सरकार के सेनापति मनमोहन से दूर दिखना चाहते हैं, जिनके दामन पर हाल में कई दाग पड़े हैं।
साथ ही चुनावी मौसम में मोदील की लगातार बढ़ती शोहरत के बीच कांग्रेस राहुल को 'हीरो' की तरह पेश करने की जरूरत शिद्दत से महसूस कर रही थी। और यह दांव इसीलिए खेला गया।
ऐसा नहीं कि सरकार से अलग दिखने की 'कलाकारी'कांग्रेस ने पहले कभी नहीं की। भूमि अधिग्रहण और सूचना के अधिकार जैसे मामलों में भी सोनिया गांधी ने अपनी ही सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ आवाज उठाई और नाराजगी का इजहार भी किया। लेकिन उनका अपना अंदाज था और यह गुस्सा संकेतों में पहुंचाया गया।
पहली बार खुलकर गुस्सा दिखाया
लेकिन जिस कदर राहुल ने खुलेआम अपनी सरकार के एक बड़े फैसले की मुखालफत की, ऐसा पहले नहीं हुआ। राहुल बयान देकर वहां से रवाना हो गए और संवाददाताओं से कोई सवाल नहीं लिया।
लेकिन उनके जाने के बाद कांग्रेस महासचिव अजय माकन ने कहा कि राहुल की राय, कांग्रेस की राय है। अध्यादेश पर उन्होंने अपनी राय सामने रखी है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह सब चुनावी ड्रामा नहीं है, क्योंकि कैबिनेट की अगुवाई में अध्यादेश पारित होता है और सत्तारूढ़ दल का इतना बड़ा नेता उसके फैसले के खिलाफ गुस्सा दिखाता है, इस पर माकन ने सियासी चाशनी में डूबा जवाब दिया। उन्होंने सवाल पूछने वाली संवाददाता से कहा, "आप अपना सवाल पूछिए। सवाल की आड़ में राय देना सही नहीं।"
जाहिर है, चुनावी बिसात और सियासी दलों की चाल पर किसी का राय देना मुनासिब नहीं और सवाल तो कतई नहीं पूछा जा सकता!