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कैग का दावा, मनरेगा में हुआ महाघोटाला

Wed, 24 Apr 2013 12:32 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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टूजी, कॉमनवेल्थ और कोयला घोटाले के बाद अब महात्मा गांधी नरेगा योजना में भी महाघोटाले का खुलासा हुआ है।
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मनरेगा पर मंगलवार को लोकसभा में पेश हुई कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस योजना के धन का गलत इस्तेमाल तो हुआ ही है, साथ ही दो वर्षों के दौरान योजना के श्रम दिवसों में भी गिरावट आई है।

33000 करोड़ रुपये की इस सालाना योजना की निगरानी के काम में भी जमकर ढिलाई बरती गई। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भी केंद्र ने कोई कार्रवाई नहीं की।

कैग का कहना है कि भ्रष्टाचार से संबंधित 85 मामलों की फाइलों में से उसे जांच के लिए सिर्फ 21 फाइलें ही दी गईं।

कैग रिपोर्ट के मुताबिक मनरेगा के लिए जारी 2252 करोड़ रुपये की राशि का उपयोग रोजगार सृजन के बजाय ऐसे कार्यों में किया गया, जिसकी मनरेगा कानून में मनाही है।
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इस संबंध में केंद्र की ओर से किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। कैग ने केंद्र की ओर से धन जारी करने के मामले में भी खामियां पाई हैं।

कई ऐसे मामले भी सामने आए जबकि मंत्रालय ने मांग से भी अधिक अनुदान जारी कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2010-11 में सरकार की ओर से धन जारी करने संबंधी शर्तों में ढील दी गई और इसका कोई आधार भी नहीं बताया है। बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में आवंटित धनराशि का सिर्फ बीस फीसदी ही उपयोग हुआ।

मनरेगा नियमों की अधिसूचना जारी करने के मामले में भी ढिलाई का रवैया ऐसा कि कानून लागू होने के सात वर्ष बाद भी हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान और यूपी आदि राज्यों में मार्च, 2012 तक इस कानून के नियम नहीं बने थे। कैग को सात राज्यों में 4.33 लाख जॉब कार्ड बगैर फोटो के मिले।

भ्रष्टाचार के मामले दबाए जा रहे
कैग ने रिपोर्ट में कहा है कि नेशनल लेवल मॉनीटर्स ही रिश्वत लेकर भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने का काम कर रहे हैं।

इस संबंध में कैग ने यूपी के एक मामले का जिक्र किया है। जिसमें चंदौली के राजीव सिंह और भरत सिंह ने मनरेगा में भ्रष्टाचार की शिकायत की थी।

लेकिन केंद्र की ओर से जुलाई 2010 में मामले की जांच के लिए गए नेशनल लेवल मॉनिटर जीआर गुप्ता ने कथित तौर पर रिश्वत लेकर इस शिकायत को फर्जी करार दिया।

शिकायतकर्ता ने जब दुबारा शिकायत की तो दिसंबर, 2010 में केंद्र ने दूसरा जांच दल भेजा, जिसमें भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए गए। कैग का कहना है कि मामले में केंद्र या राज्य ने कार्रवाई के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाए हैं।

कैग रिपोर्ट में क्या खास
-47687 से अधिक मामलों में लाभार्थियों को नहीं रोजगार मिला और नही बेरोजगारी भत्ता।
-23 राज्यों में लाभार्थियों को रोजगार दिया गया लेकिन मजदूरी नहीं, कहीं मजदूरी मिली भी तो काफी देर से।
-मनरेगा के तहत किए गए काम पांच वर्षों में भी आधे-अधूरे, निर्माण कार्य की गुणवत्ता भी खराब।
-मनरेगा के तहत आवंटित धन का 60 फीसदी मजदूरी और 40 फीसदी निर्माण सामग्री पर खर्च के अनुपात का नहीं हुआ पालन।
-केंद्र के स्तर पर निधियों के आवंटन में भी पाई गई खामियां, 2011 में जारी 1960.45 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं।
-मनरेगा से गरीबों का मोह भंग, घटने लगी है श्रम दिवसों की संख्या, वर्ष 2009-10 में 283.59 करोड़ श्रम दिवस के मुकाबले 2011-12 में घटकर रह गए 216.34 करोड़ श्रम दिवस।

मनरेगा के बारे में कैग की रिपोर्ट पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि उसका काम खामियां निकालना है। कैग ने मनरेगा के बारे में कुछ अच्छी तसवीर भी पेश की है। पर यह भी सच है कि हर राज्यों में इस योजना के फंड का गलत इस्तेमाल हो रहा है।
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जयराम रमेश, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री

यूपी बिहार में कम खर्च हुआ धन
देश के सर्वाधिक गरीब राज्यों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में इस योजना का क्रियान्वयन कमजोर रहा और इन राज्यों में मनरेगा की धनराशि भी अपेक्षाकृत कम खर्च हुई। इन तीनों राज्यों में देश के 46 फीसदी गरीब रहते हैं।
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