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जब राजनारायण के सामने पिघला इंदिरा का लोहा...

Thu, 20 Mar 2014 11:53 AM IST
विनोद अग्निहोत्री/अमर उजाला, दिल्ली
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आपातकाल के 19 महीनों के बाद लोकसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी थी और सत्तारूढ़ कांग्रेस और चार दलों को मिलाकर नवगठित जनता पार्टी के बीच चुनावी मुकाबला शुरू हो गया था। पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर की नजर सबसे ज्यादा रायबरेली सीट पर थी, जहां से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता पार्टी ने धुर समाजवादी नेता राजनारायण को मैदान में उतारा था।
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हालांकि राजनारायण इसके पहले 1971 में हुए लोकसभा चुनावों में भी रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़े थे, लेकिन तब वह हार गए थे। तब उन्होंने इंदिरा गांधी पर सरकारी तंत्र के दुरुपयोग और चुनाव में हेराफेरी का आरोप लगाते हुए चुनाव नतीजों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

राजनारायण की तरफ से जाने-माने वकील शांति भूषण (जो बाद में जनता पार्टी सरकार में देश के कानून मंत्री बने और इन दिनों भी अपनी जनहित याचिकाओं, अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी में सक्रियता के लिए अपने बेटे प्रशांत भूषण के साथ खासे चर्चित हैं) और इलाहाबाद के एक और मशहूर अधिवक्ता और समाजवादी विचारधारा के आर सी श्रीवास्तव ने यह मुकदमा लड़ा।
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एक फैसला लाया सियासी भूचाल

राजनारायण की चुनाव याचिका पर ही फैसला देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया था। न्यायालय के इस फैसले से देश में सियासी भूचाल आ गया। यह वह समय था जब इंदिरा गांधी की तूती पूरे देश में बोल रही थी।

1971 के बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की विजय के बाद इंदिरा राजनीति में दुर्गा के रूप में देखी जाने लगी थीं। ऐसे में अदालत के इस फैसले ने न सिर्फ उनकी अपरिमित सत्ता को चुनौती दी बल्कि उनकी छवि को भी झकझोर दिया। इंदिरा गांधी ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और इसी आधार पर अपना इस्तीफा देने से इनकार कर दिया।

देश में इसके पहले से ही राजनीतिक असंतोष व्याप्त था। गुजरात में छात्रावास की समस्याओं को लेकर तत्कालीन चिमन भाई पटेल की सरकार के खिलाफ शुरु हुआ छात्र आंदोलन जल्दी ही पूरे उत्तर भारत में फैल गया। बिहार इसका प्रमुख केंद्र बन गया और वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी जय प्रकाश नारायण अपना सर्वोदय व्रत छोड़कर आंदोलन के प्रणेता बन गए।

छात्र आंदोलन बना व्यवस्‍था बदलाव आंदोलन

उनके नेतृत्व में बिहार की तत्कालीन अब्दुल गफूर सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन जल्दी ही देश में व्यवस्था बदलाव का आंदोलन बन गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर सभी विपक्षी दल अपने वैचारिक मतभेद भुलाकर इसमें कूद पड़े।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने आग में घी का काम किया और जेपी आंदोलन का मुख्य मुद्दा इंदिरा गांधी हटाओ में बदल गया। आंदोलन को दबाने के लिए केंद्र और राज्य की कांग्रेसी सरकारों ने हर हथकंडा अपनाया। आंदोलन के पीछे अमेरिकी एजेंसी सीआईए का हाथ होने तक के आरोप लगाए गए।

आंदोलन नहीं रुका और पटना के गांधी मैदान में हुई विशाल रैली में जय प्रकाश नारायण ने जब सेना और सुरक्षा बलों का आह्वान किया वह सरकार के अवैध आदेशों को मानने से इन्कार कर दें, इसे आधार बनाकर इंदिरा गांधी सरकार ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा दिया और सभी विपक्षी नेता, आंदोलनकारियों की अंधाधुंध गिरफ्तारी करके उन्हें जेल में डाल दिया गया।

आपात काल का फायदा इंदिरा को

करीब 19 महीने आपातकाल देश पर लागू रहा। इस दौरान सभी नागरिक अधिकार निलंबित हो गए। प्रेस पर सेंसर लगा दिया गया। जहां सर्वोदय आंदोलन के एक शिखर जय प्रकाश नारायण डायलिसिस पर होने के बावजूद जेल में थे, वहीं दूसरे शिखर विनोबा भावे ने आपातकाल को अनुशासन पर्व की संज्ञा दी और मौन व्रत धारण कर लिया।

इंदिरा गांधी को जब यह अहसास हुआ कि अब देश में माहौल उनके पक्ष में है और जेल में बंद विपक्षी नेताओं के हौसले टूट चुके हैं, तो उन्होंने आम चुनाव की घोषणा कर दी। आपातकाल के बाद मार्च 1977 में होने वाले आम चुनावों में राजनारायण फिर रायबरेली में इंदिरा गांधी को चुनौती दे रहे थे।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर रायबरेली उन दिनों एक बेहद पिछड़ा इलाका होता था। लखनऊ से इलाहाबाद जाने वाली सड़क पर बसा रायबरेली कस्बानुमा शहर था। इंदिरा गांधी का इस इलाके से पुराना रिश्ता तब से था जब वह अपने पति फिरोज गांधी के साथ यहां रहती थीं।

रायबरेली में फिर बिछी बिसात

फिरोज गांधी रायबरेली से ही लोकसभा में चुने जाते थे। जबकि इंदिरा के पिता जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद के रहने वाले थे और निकट के फूलपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते थे। इंदिरा इस इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ थीं और प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस इलाके में विकास की गंगा बहानी शुरु कर दी थी। इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी भी बगल की अमेठी सीट से अपना पहला चुनाव लड़ रहे थे।

इसके विपरीत राजनारायण का इस इलाके से सिर्फ इतना ही नाता था कि वह इंदिरा के खिलाफ पिछला चुनाव लड़ चुके थे। लेकिन बनारस और इलाहाबाद उनकी कर्मभूमि होने के कारण राजनारायण का यहां आना जाना जरूर था। उन दिनों चुनाव आयोग की इतनी सख्ती नहीं थी और सत्ताधारी नेता सरकारी साधनों का खुलकर उपयोग करते थे।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पूरे लाव-लश्कर और तामझाम के साथ चुनाव प्रचार कर रही थीं, जबकि राजनारायण सिर पर हर पटका बांधे धूप और गर्मी में साईकिल, रिक्शा, टेंपों, जीप पर बैठकर शहर की गलियों के चक्कर लगाते और गावों की धूल फांकते थे। इंदिरा गांधी के लिए रायबरेली का विकास, देश के प्रधानमंत्री को चुनने और रायबरेली से अपने पुराने रिश्ते जैसे मुद्दे प्रमुख थे।
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जो हुआ, वो सोचा न था

जबकि राजनारायण तानाशाही से लोकतंत्र को बचाने, एक परिवार और एक पार्टी के शासन व एकाधिकार को खत्म करने और आपातकाल में हुई जबरन नसबंदी को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रहे थे। पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस विरोधी लहर थी, लेकिन किसी को भी यह आभास नहीं था कि इंदिरा गांधी भी चुनाव हार सकती हैं।

लेकिन जब नतीजे आए तो आधी रात को आकाशवाणी से घोषणा हुई की रायबरेली लोकसभा सीट पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने प्रतिद्वंदी जनता पार्टी के राजनाराण से करीब 55 हजार मतों से चुनाव हार गई हैं तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। आपातकाल का दंश झेल रही जनता में हर्ष की लहर दौड़ गई। इंदिरा गांधी ने अपनी हार स्वीकार की और बाद में, आपातकाल के लिए खेद भी जताया। बीमार जय प्रकाश नारायण से मिलने वह अस्पताल भी गईं।

राजनारायण को देश विदेश के मीडिया ने जबर्दस्त कवरेज दिया और विदेशी मीडिया में उन्हें भारत का पूअर लिटिल जिमी कार्टर तक कहा गया, जिसने भारत की आयरन लेडी को वैसी ही शिकस्त दी जैसी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जिमी कार्टर की भारी मतों से जीत हुई थी। लेकिन सिर्फ ढाई साल बाद ही केंद्र की जनता पार्टी सरकार अपने अंतर्विरोधों से गिर गई और 1980 में हुए मध्यावधि चुनावों में इंदिरा गांधी फिर राजनारायण को हराकर रायबरेली से चुनाव जीतीं।
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