देश में बढ़ती असहिष्णुता की घटनाओं पर छिड़ी बहस को आगे बढ़ाते हुए जाने माने अर्थशास्त्री, चिंतक और नोबेल से सम्मानित अमर्त्य सेन ने कहा कि असहिष्णुता को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। देश के लोग असहिष्णु नहीं है। एक संगठित समूह असहिष्णुता फैला रहा है। ऐसे में असहिष्णुता के खिलाफ असहिष्णु होना जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा कि जब जब अल्पसंख्यकों पर हमले होते हैं तो इन घटनाओं के विरोध में देश और सरकार का समर्थन नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार में भी अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं थे, जबकि मौजूदा सरकार में प्रतिबंध ज्यादा बढ़ गए हैं।
दादरी घटना का जिक्र करते हुए सेन ने कहा कि संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि बीफ खाने वाले पर हमला कर दिया जाए। उन्होंने चिंता जताई कि देश में किसी की धार्मिक भावना प्रभावित होने पर लोगों की हत्या कर दी जाती है।
दादरी की घटना और खान पान में दखलंदाजी का किया विरोध
सेन शुक्रवार को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से इंडिया इंटरनेशल सेंटर में आयोजित राजेन्द्र माथुर स्मृति व्याख्यान के मौके पर अपने विचार जाहिर कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश में ज्यादातर भारतीय एक दूसरे के खाने पीने की आदत और धर्म पर आपत्ति नहीं जताते हैं।
सेन ने कहा कि वक्त आ गया है कि देश की शीर्ष अदालत को भी अब यह परिभाषित कर देना चाहिए कि मैं क्या खाऊंगा, मैं क्या पहनूंगा या मैं व्यक्तिगत रूप से क्या करता हूं उस पर किसी के टिप्पणी करने या आपत्ति जताने से मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है या नहीं।
सेन ने कहा कि देश में असहिष्णुता की घटनाएं एक संगठित समूह कर रहा है। एम एफ हुसैन का देश छोड़ने और सलमान रुश्दी पर प्रतिबंध लगाने जैसी घटनओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों पर हमला होता है तो इसके खिलाफ सरकार का समर्थन नहीं होता।
उन्होंने मध्य प्रदेश में मिड डे मील में अंडा देने पर रोक लगाने को गलत बताया। सेन ने कहा कि देश में बढ़ रही असहिष्णुता को लेकर हम संविधान को दोषी नहीं ठहरा सकते। हालांकि उन्होंने ब्रिटिश काल के कानून को बदलने की जरूरत पर बदल दिया।
ब्रिटिश सरकार में बने कानून को बदलने की जरूरत बताई
अभिव्यक्ति की आजादी के लिए संविधान में बदलाव होना चाहिए। सेन ने अफसोस जताया कि महान चित्रकार एम एफ हुसैन को एक समूह के दबाव के चलते देश से बाहर जाना पड़ा। साथ ही उन्होंने कहा कि दुनिया में भारत ही पहला देश था जिसने सलमान रुश्दी पर उनकी किताब के लिए प्रतिबंध लगाया।
उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान कहा कि लोकतंत्र बहुसंख्यकों का शासन नहीं है। उन्होंने कहा कि अब यदि आप भारत के बारे में सोचेंगे, जब हम कहते हैं कि लोकतंत्र को कुछ खतरा हो सकता है, मुद्दे क्या हैं?
सबसे पहले लोकतंत्र केवल बहुसंख्यकों का एक शासन नहीं है, इसमें अल्पसंख्यकों के अधिकार भी शामिल हैं, इसमें स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि भी शामिल है।
वहीं कार्यक्रम के दौरान पत्रकार राजेन्द्र माथुर के जीवन पर एक मिनट की शार्ट फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया। जिसमें राजेन्द्र माथुर ने कहा, हमारा लोकतंत्र एक बगीचा है जिसमें तरह तरह के फूल हैं। इन सब फूलों के बीच कोई फूल यह नहीं कह सकता कि मेरा अलग उपवन होना चाहिए अलग बगीचा होना चाहिए। इस तरह तो तमाम फूल अपने लिए अलग बगीचे की मांग करने लगेंगे और लोकतंत्र रूपी यह बगीचा उजड़ जाएगा।