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इन्होंने खोजा अनसुनी आवाजों को सुनने का समाधान

Fri, 21 Mar 2014 09:01 AM IST
अभिषेक सक्सेना/अमर उजाला, नई दिल्ली
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आखिर क्या वजह है कि विकास की मुख्यधारा से कटे आदिवासियों की आवाज अनसुनी रह जाती है, जबकि संतुलित विकास के लिए इन्हें तुरंत सुने जाने की जरूरत है? इस सवाल का जवाब वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने ढूंढा, जिन्होंने अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए के व्हीसल ब्लोअर एडवर्ड स्नोडन को पछाड़ते हुए इंग्लैंड का प्रतिष्ठित 'डिजिटल एक्टिविज्म अवॉर्ड फ्रॉम इंडेक्स ऑन सेंसरशिप' हासिल किया है।
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वह 10 साल तक बीबीसी के साउथ एशिया प्रोड्यूसर रहने के अलावा गार्जियन अखबार से भी जुड़े रहे हैं। शुभ्रांशु मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में पिछले कई वर्षों से सीजी नेट स्वर नामक प्रयोग कर रहे हैं। वह आदिवासियों और बाकी भारत के बीच संवादहीनता को नक्सलवाद की मूल वजह बताते हैं।

गवर्नेंस में सुधार के लिए वह लोकतांत्रिक ढंग से न्यूज जुटाने पर जोर देते हैं और सीजीनेट स्वर को वह सामूहिक समस्याओं के समाधान का एक जरिया बताते हैं। इन्हीं मुद्दों पर अभिषेक सक्सेना से उनकी बातचीतः
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प्रश्न- यह सीजीनेट स्वर है क्या ?

सीजीनेट स्वर मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने का एक प्रयोग है। इसमें कोई व्यक्ति मोबाइल फोन के जरिये अपनी बात कह सकता है जो सीजीनेट स्वर के कंप्यूटर में रिकॉर्ड होने के बाद इंटरनेट और मोबाइल फोन के जरिये पत्रकारों, अधिकारियों और शेष भारतीयों तक पहुंच जाती है।

प्रश्न- ऐसे प्रयोग का विचार आपके दिमाग में कैसे आया ?
दरअसल अपनी एक किताब के सिलसिले में कुछ नक्सलियों से मेरी बातचीत हुई। उन्होंने मुझे बताया कि असल दिक्कत यह है कि उनकी आवाज लोगों तक पहुंच ही नहीं पाती। और इसी वजह से लोग जान ही नहीं पाते कि वह चाहते क्या हैं। अगर मीडिया लोकतांत्रिक हो तो सारी समस्याएं खुद ब खुद हल होती चली जाएंगी। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता, और इसी वजह से विकास का पूरा मॉडल असंतुलित हो जाता है। हालत यह है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जो अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं, वह गोंडी भाषा बोलना तो दूर, समझ भी नहीं पाते।

बस यही सुनकर मेरे दिमाग में एक ऐसे तंत्र को बनाने की बात आई, जिसके जरिये आदिवासी स्‍थानीय स्तर की अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें। मुझे लगता है कि अगर यह प्रयोग कामयाब रहता है तो आदिवासियों को हिंसक आंदोलनों से जुड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

प्रश्न- लेकिन ऐसे पोर्टल को संचालित करने में कुछ प्रशासनिक अड़चनें तो जरूर आई होंगी?

एक कहावत है कि उदार राजा गवर्नेंस के लिए आदर्श होता है। लेकिन अगर ऐसा न हो, तो विकल्प ढूंढने पड़ते हैं। इसी तरह, अगर अधिकारी ईमानदार हो, तो कोई समस्या नहीं आती। लेकिन भ्रष्ट अधिकारी हमारे काम में व्यवधान पैदा करते हैं।

खबरें भेजने वालों को भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की तरह तमाम तरह के दबावों का सामना करना पड़ता है। इसीलिए हम खबर भेजने वालों को खुद रिपोर्ट करने की बजाय दूसरों से कराने पर जोर देते हैं।

हम यह भी कहते हैं कि अगर पुलिस परेशान करे, डर लग रहा हो, तो मत करो। अभी हमारा कैडर तैयार नहीं है, इसलिए ऐसी दिक्कतें स्वाभाविक हैं।

प्रश्न- आपने मीडिया के लोकतंत्रीकरण की बात की, तो आपका इशारा वैश्विक मीडिया की ओर है, या केवल भारतीय मीडिया?

पूरी ‌दुनिया का मीडिया इसी समस्या से जूझ रहा है। लेकिन हर देश के हालात अलग होते हैं, इसलिए हमें अपने हल खुद ही तलाशने होंगे। फिनलैंड में सौ फीसदी इंटरनेट है, ल‌ेकिन भारत इस मामले में पीछे है। एक बड़ी तादाद में यहां लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते, लेकिन आवाज उठाने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

मध्य प्रदेश के मंडला गांव को ही लीजिए। यहां बिजली नहीं है, केवल 80 फोन हैं। हम यहां के लोगों को रोज एक संदेश का टेक्‍स्ट देते हैं, जैसे 'आपके घर में बिजली क्यों है, जबकि हमारे यहां नहीं'। इसके अलावा हम अधिकारियों के फोन नंबर्स भी मुहैया कराते हैं।

दरअसल, हम एक प्रयोग कर रहे हैं जो न्यूज एकत्र करने के तरीके के लोकतंत्रीकरण पर आधारित है। सामूहिक समस्याओं के निवारण का हम एक जरिया बनना चाहते हैं। हमारा यह भी मानना है कि गवर्नेंस में सुधार और लोगों का लोकतंत्र में भरोसा कायम रखने के लिए जरूरी है कि न्यूज एकत्र करने में लोकतंत्रीकरण का समावेश किया जाए। राजनीतिक लोकतंत्र बेहतर तभी होगा, जब लोकतांत्रिक ढंग से संवाद हो।
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प्रश्न- आपका मॉडल सिटीजन जर्नलिस्ट के जैसा है ?

कह सकते हैं, लेकिन फिलहाल मैं अपने को पत्रकार नहीं कहना चाहता। मै पत्रकार न होकर 'बोलकार' कहलाना ज्यादा पसंद करूंगा।

प्रश्न- आपकी पहल का क्या असर हो रहा है?
जिन संदेशों को हम प्रसारित करते हैं, उनमें से हर हफ्ते 1-2 मामलों में समस्या का समाधान हो जाता है। हमारा जोर उन मुद्दों से जुड़ी कॉलों पर होता है, जिन्हें मीडिया नहीं उठा पा रहा है। इसके अलावा मुद्दे सामूहिक होने चाहिए।

प्रश्न- क्या कभी नक्सलवादियों ने सूचना देने के लिए आपके तंत्र को जरिया बनाया है?
हम अपनी जिम्मेदारी समझते हैं, और इसीलिए ऐसी स्थितियों से बचते हैं। एक वजह और है कि एक तो हमारे पास क्षमता नहीं है, दूसरा, ऐसी जानकारियों को हम क्रॉस्‍ा चेक भी नहीं कर सकते।

प्रश्न- स्नोडेन को पछाड़कर पुरस्कार पाने को किस तरह देखते हैं?
मेरे पक्ष में वोट देने वाले एक शख्स ने मुझसे कहा था,''स्नोडन का काम एक धमाके की तरह है, लेकिन व्यवस्‍था में बदलाव ऐसे नहीं आता। इसके लिए सतत ढंग से काम करना पड़ता है, जो आप कर रहे हैं।'' शायद यही वजह है कि मुझे स्नोडेन की तुलना में ज्यादा वोट मिले।
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