फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'चौंका सकता है असल नतीजा, एग्जिट पोल में कई कमियां'

विज्ञापन
विज्ञापन
चुनाव बाद प्रसारित एग्जिट पोल की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का सिलसिला थमा नहीं है। कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने इन्हें पहले ही खारिज कर दिया है, चुनाव विश्लेषक भी अब इसे संशय से देखने लगे हैं।
विज्ञापन


हालांकि, मुफीद नतीजे पाकर भाजपा की बांछे खिली हु्ई हैं। चुनाव विश्लेषकों ने एग्जिट पोल के सैंपल, सैंपल के आकार और सर्वेक्षण के तरीकों पर सवाल उठाया है।

अमर उजाला से बातचीत में चुनाव विश्लेषक सुदीप श्रीवास्तव ने कहा है कि एग्जिट पोल पर भरोसा करना मुश्किल है। नतीजे इसके उलट भी हो सकते हैं। पढ़िए, बातचीत के प्रमुख अंश-
विज्ञापन

बहुत कम लिया गया है सैंपल साइज

सवालः हाल में आए ‌एग्जिट पोल्स के अनुमानों पर आप की क्या राय है?

जवाबः एग्जिट पोल के अनुमानों को लेकर मुझे संदेह है। कई ऐसी बाते हैं, जिससे ये ए‌ग्जिट पोल में संदिग्ध दिखते हैं। जैसे सैंपल साइज ही लीजिए, हमारे देश में 543 लोकसभा सीटें हैं। हर सीट पर 15 से 16 लाख वोटर हैं। हर लोकसभा को 5 से 10 विधानसभाओं को बांटा गया है। ऐसे में यदि आपको किसी भी लोकसभा सीट के बारे में ठीक-ठीक अनुमान लगाना है, तो कम से कम 1000 लोगों का सैंपल होना चा‌हिए। 543 सीटों से गुणा करें तो ये आंकड़ा 5 लाख 43 हजार हो जाता है। लेकिन किसी भी सर्वेक्षण एजेंसी ने दो से तीन लाख से ज्यादा सैंपल नहीं लिया। मतलब यह है कि एक लोकसभा में 300 से 400 लोगों से बातचीत की गई। विधानसभा के हिसाब से देखें तो 30 से 40 लोग। इतने कम सैंपल से कैसे ठीक-ठीक अनुमान लगाया जा सकता है?

'रिप्रेंजेटेटिव कॉस्टीटुएंसी' का तरीका गड़बड है

सवालः सैंपल साइज के अलावा भी सर्वेंक्षणों में गड़बड़ी हो सकती है?

जवाबः ए‌ग्जिट पोल के अनुमान 'रिप्रेंजेटेटिव कॉस्टीटुएंसी' की पद्घति पर आधारित है। मतलब यह कि उन्होंने किसी राज्य से एक सामान्य सीट ली, एक अनुसूचित जाति की और एक अनुसूचित जनजाति की। एक सामान्य सीट का सैंपल लेकर राज्य की अन्य सामान्य सीटों के बारे में घोषणा कर दी। ऐसा ही उन्होंने अनुसूचित जा‌ति और जनजाति की सीटों के बारे में भी किया। लेकिन ये कैसे संभव हो सकता है कि किसी एक सीट को वोटिंग पैटर्न दूसरी सीट पर भी लागू हो जाए। इसे ऐसे समझिए, छत्तीसगढ़ में चार सीटे अनुसुचित जनजातियों के लिए सुरक्षित है, उसमें से आपने एक सीट छांट ली। उसी के आधार पर आपने अनुसूचित जाति के सभी सीटों का अनुमान लगा लिया। ये कैसे संभव है? इसमें एक दिक्कत और है। जैसे आपने जो सीट ली अगर वो कंवर बहुल सीट है तो उससे गोड़ जनजाति के वोटों का पैटर्न नहीं पता चलेगा। एक और बात आपने जो सीटें छोड़ी हैं, मान लीजिए वहां कांग्रेस का उम्मीदवार गोंड या किसी दूसरी जनजाति का है तो वहां को उसी जाति का वोटिंग पैटर्न वह नहीं होगा, जो किसी कंवर बहुल सीट पर हो। ऐसे बहुत से समीकरण, जब आप किसी सीट को 'रिप्रेंजेटेटिव कॉस्टीटुएंसी' मानकर कर सर्वे करते हैं तो छूट जाते हैं। जब आप 180 सीटों को 'रिप्रेंजेटेटिव कॉस्टीटुएंसी' मानकर 543 सीटों का अनुमान लगाएंगे तो गड़बड़ी की आशंका बनी रहेगी।

उ‌चित अनुमान के ‌लिए सैंपल साइज क्या हो

सवालः आपके हिसाब से सैंपल साइज क्या होना चाहिए?
जवाबः मेरे हिसाब से कम से कम 5 लाख 43 हजार लोगों का सैंपल होना चा‌हिए। एक लोकसभा में कम से कम 1000 होना चाहिए। 5 विधानसभा वाले क्षेत्रों में 200 लोगों से बातचीत और 10 विधानसभा वाले क्षेत्रों में कम से कम 100 लोगों से बातचीत।

सवालः सैंपल साइज के अलावा क्‍या बात मायने रख्‍ाती हैं?

जवाबः इसके अलावा जो महत्वपूर्ण बात है, वह यह कि सर्वे कोऑर्डिनेट कौन कर रहा है। जो आदमी कोऑर्डिनेट कर रह वह कितना उपयुक्त है, वह बिना किसी पूर्वाग्रह के काम कर रहा हो। अगर ये मान ‌लिया जाए कि जितने सर्वे हो रहे हैं, उसमें पढ़े-लिखे लोग कर रहे हैं, कुछ सर्वें में प्रोफेसर भी जुडे हुए हैं, इसके बाद ये भी देखना पड़ेगा कि जो ग्राऊंड पर सर्वे कर रहा है, उसका अपना पूर्वाग्रह तो नहीं है। ऐसे सर्वेक्षणों में सामन्यतया ऊंची जातियों के लोग मिलते हैं, उसके बाद ओबीसी और दलित, अल्पसंख्यक उससे भी कम। ऐसे में अगर एक ऊंची जाति का सर्वेयर किसी दलित युवक के पास जाए तो शायद ही वह युवक खुलकर अपनी राय बताए। जबकि अगर ऊंची जाति का युवक होगा तो खुलकर बात करेगा। ऐसे में सर्वेयर की पहचान और पूर्वाग्रह भी मायने रखता है।

जनसंख्या के प्रारूप का क्‍या है मायने

सवालः राज्‍य में जनसंख्या का प्रारूप भी मायने रखता है?

सर्वे के क्षेत्र की जनसंख्या का प्रारूप भी महत्वपूर्ण है। अगर आपने ऐसा एरिया लिया है, जिसकी जनसंख्या का पैटर्न राज्य की जनसंख्या से मेल नहीं खाता तो आप का आकलन गड़बड़ हो सकता है। इसके अलावा केवल मतदान ही एक ऐसा अधिकार है, जिसे लेकर संविधान भी आप को झूठ बोलने की इजाजत देता है। ऐसे में एक मतदाता अपने मत की गोपनीयता बनाए रखने के ‌लिए आप को गलत जानकारी भी दे सकता है। इस बात की संभावना बनी रहती है कि वोटर थोड़ा झूठ बोलेगा। अच्छे चुनाव सर्वेक्षक हमेशा थोड़े बहुत फेरबदल की संभावना रखते हैं।

एग्जिट पोल में राज्यों के आंकड़े कितने ठीक?

सवालः एग्जिट पोल में राज्यों के आंकड़े कितने ठीक होते हैं?

जवाबः एग्जिट पोल के साथ एक बात और है। ये केवल ट्रेंड बताता है कि वोटर किधर जा रहा है। राज्यवार सही आंकड़े बता पाना बहुत मुश्किल है। आप 2009 या 2004 के आंकड़े देखें तो पाएंगे के उत्तर प्रदेश के बारे में जो अनुमान लगाया गया वो गलत रहा। ऐसा ही दूसरे राज्यों के बारे में भी पाएंगे। देश के बारे में हो सकता है कि आपका अनुमान थोड़ा बहुत ठीक रहे, लेकिन राज्यवार ठीक-ठीक सीट बता पाना कठिन है।
विज्ञापन

चौंका सकता है 'मार्जिन ऑफ एरर'

सवालः 'मार्जिन ऑफ एरर' को लेकर आपकी क्या राय है?

जवाबः 'मार्जिन ऑफ एरर' कभी सीटों के लिए नहीं होता। ये वोटों के लिए होता है। 3 प्रतिशत 'मार्जिन ऑफ एरर' की बात की जा रही है, ये बहुत बड़ा है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जहां बहुको‌णीय मुकाबला है, ये 'मार्जिन ऑफ एरर' चौंका सकता है।

(सुदीप श्रीवास्तव कई चुनाव सर्वेक्षण कर चुके हैं। चुनावों पर ही इन्होंने 'चुनाव का मनोविज्ञान' नामक किताब भी लिखी है।)
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें