फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ईरान को लेकर इंदिरा गांधी को क्या था डर?

विज्ञापन
विज्ञापन
ऐसा नहीं कि भारत के ईरान के इस्लामी क्रांति के नेताओं से अच्छे संबंध नहीं हैं पर इसके बावजूद दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध गहरे नहीं हैं। ईरान-इराक लड़ाई शुरू होने के वक्त तब भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का मानना था कि इसका सीधा असर भारतीय महाद्वीप के सभी देशों पर पड़ेगा और यही हुआ भी।
विज्ञापन


इंदिरा मानती थीं कि भारतीय महाद्वीप में बड़ी संख्या में सुन्नी मुसलमान रहते हैं और उनके कट्टरपंथी कभी भी बढ़ते हुए फारसी शिया प्रभाव को नहीं कुबूलेंगे। जनरल ज‌िया उल हक ने इसे रोकने के लिए पाकिस्तान को पूरी तरह सऊदी अरब से जोड़ा और कट्टरपंथी ताकतों को भी बढ़ावा दिया, जिसके बदले उनकी सरकार को और वहां की धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक मदद मिली।

इन्हीं कट्टरपंथी संस्थाओं की मदद से पाकिस्तान ने चरमपंथी संगठनों बनाए, जिनका इस्तेमाल अफगानिस्तान और जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता फैलाने के लिए किया गया। ईरान-इराक लड़ाई के बारे में भारत का मानना था कि यह लड़ाई दो मित्र देशों के बीच है और भारत दोनों से अपनी मित्रता बनाए रखने के हक में है।
विज्ञापन

10 लाख लोगों की जान गई

भारत ने लड़ाई खत्म करने की अपील की थी लेकिन ईरान चाहता था कि भारत खुलकर उसका साथ दे और राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को ईरान पर आक्रमण के लिए दोषी ठहराए। यदि भारत खुलकर ईरान या इराक का साथ देता तो उसका प्रभाव सीधे भारत में रहने वाले लगभग 13 करोड़ मुसलमानों के आपसी संबंधों पर पड़ता, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक शिया हैं।

लड़ाई करीब आठ साल चली, जिसमें 10 लाख लोगों की जान गई। इनमें अधिकतर ईरानी थे। भारत अरब और फारसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता। उसकी नीति दोनों से संबंध बनाए रखने की है।

ईरान के रवैये में तब बदलाव आया जब राष्ट्रपति हाशमी रफ़संजानी सत्ता में आए और उन्होंने भारत-ईरान मैत्री पर जोर दिया। उन्होंने काफी हद तक ईरान में इंदिरा गांधी की आर्थिक विकास नीतियों को अपनाया, जिसमें आत्मनिर्भरता पर काफी जोर दिया गया था।

संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों को ईरान पर प्रतिबंध लगाने पड़े

इस नीति के चलते ईरान ने परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा उत्पादन का काम शुरू किया। राष्ट्रपति खातमी, जो ईरान के एक उदारवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं उन्होंने इन नीतियों को व्यापक रूप से आगे बढ़ाया।

उनके शासनकाल में भारत और ईरान के संबंध और मजबूत हुए। ईरान में जब-जब उदारवादी सत्ता में आए, तब-तब दोनों देशों के संबंधों और मजबूत हुए।

अहमदीनेजाद कट्टरपंथी नेता थे। उनके शासनकाल में भारत और ईरान के संबंध उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़े। इसका सबसे बड़ा कारण उनकी कट्टरपंथी नीतियां थीं, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देशों को ईरान पर प्रतिबंध लगाने पड़े।

इसके अतिरिक्त भारत भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम से चितिंत था। उसका मानना था यदि ईरान ने परमाणु बम बनाया, तो क्षेत्र के दूसरे देश भी उसे हासिल करने की कोशिश करेंगे। इससे क्षेत्र की स्थिति और बिगड़ जाएगी।
विज्ञापन

भारत ने ईरान के खिलाफ आईएईए में मत दिया

इसी कारण भारत ने ईरान के खिलाफ आईएईए में मत दिया जिसकी ईरान ने बहुत आलोचना की। भारत ईरान की परमाणु समस्या का समाधान बातचीत के जरिए ढूंढना चाहता था और उसने संभावित लड़ाई का विरोध किया था। ईरान रणनीतिक दृष्टि से एक अहम देश है।

भारत के लिए वह अफगानिस्तान और मध्य एशिया जाने का एक मुख्य मार्ग है। ईरान चारों ओर से घिरे मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान को जोड़ने का काम काफी समय से कर रहा है, जहां तेल, गैस और दूसरे खनिज पदार्थों के बड़े भंडार हैं और जिसके लिए भारत एक बड़ा बाजार है।

पश्चिमी देशों के ऊर्जा और बैकिंग से जुड़े प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने ईरान से तेल व्यापार बनाए रखा। भारत केवल संयुक्त राष्ट्र के ईरान पर लगे प्रतिबंधों के पक्ष में था।

भारत और ईरान मिलकर अफगानिस्तान में अशरफ गनी की सरकार को चरमपंथ के विरूद्ध लड़ने में मदद देते हैं और दोनों वहां पुर्ननिर्माण के काम भी करते हैं। भारत की सारी सामग्री अफगानिस्तान को ईरान के ज़रिए पहुंचती है।

भारत ईरान में चाबहार पोर्ट भी बना रहा है, जो आने वाले वक्त में अफगानिस्तान को रेल और सड़क के जरिए जोड़ेगा। भारत नहीं चाहता कि ईरान आने वाले समय में पाकिस्‍तान और चीन के साथ मिलकर भारत के विरुद्ध कोई धुरी बनाए। दोनों देश की रणनीति में काफ़ी हद तक समानता के बावजूद भारत-ईरान के बीच बहुत सी विदेशी नीतियों को लेकर मतभेद भी दिखाई देते हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें