दुबई में रोटी को तरस रहे यूपी के आकाश ने अपनी मदद के लिए सोशल साइट का सहारा लिया और विदेश मंत्रालय की ओर से उसे मदद का आश्वासन भी मिल गया है। आकाश ने मुबंई से वीजा लिया और किसी मौलवी ने उसे दुबई भेज दिया काम करने के लिए, लेकिन वहां वो भूख से मर रहा है।
ऐसे न जाने कितने और आकाश होंगे जो खाड़ी मुल्कों में अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कमाने खाने जाते होंगे, लेकिन उन्हें वहां या तो भूख मिलती या फिर जेल। इस भूख और जेल के पीछे कई सारी वजहें हैं।
गर आंकड़ों की बात करें तो जिस दुबई में आकाश फिलवक्त भूख से लड़ रहा है, वहां की कुल आबादी में 22 लाख भारतीय हैं यानी करीब 31.7 फीसदी लोगों की आबादी केवल भारतीयों की है। बात करें सऊदी अरब की तो यहां 19 लाख भारतीय हैं तो वहीं कुवैत में करीब 5 लाख 80 हजार भारतीय।
इन मुल्कों में काम करने जाने वाले भारतीयों में से कोई मकैनिक है, कोई ड्राइवर, तो कोई चपरासी। बेहतर कल के लिए अपना आज गंवा बैठने वाले लोगों की मदद करने के लिए शायद खुदा भी नहीं आते। ऐसे न जाने कितने आकाश जाने अनजाने मुल्क की बड़ी सी अर्थव्यवस्था का एक छोटा सा हिस्सा हैं।
अगर हम देश की अर्थव्यवस्था में ऐसे आकाशों के योगदान की बात करें तो ये हर साल करीब 14 से 15 हजार मिलियन डॉलर देश में भेजते हैं जो केवल दुबई के आंकड़े हैं। सऊदी अरब की बात करें तो वहां से भी हर साल लगभग 7 से 8 मिलियन डॉलर रकम देश में आती है।
सन् 2014 के आंकड़ों की बात करें तो भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा रुपए भेजे गए जिनकी कुल राशि 70.39 मिलियन डॉलर है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएई यानी दुबई का दौरा कर के आए थे। जहां उन्होंने कुछ समझौते भी किए।
यहां तक की एक मंदिर बनवाने के लिए जमीन का इंतजाम भी कर आए , वहां मौजूद भारतीयों से पल दो पल की मुलाकात भी की लेकिन उनकी सुरक्षा और वहां की जेलों में बंद भारतीयों के बारे में शायद सवाल पूछना या कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा।
वहीं के एक अखबार खलीज टाइम्स से साक्षात्कार के वक्त यूएई में भारतीयों की सुरक्षा पर उन्होंने बोला था कि ''जहां तक भारतीय समुदाय का सवाल है , जो भाषाएं भारत में बोली जाती हैं, वे सभी यूएई में बोली जाती हैं। इस लिहाज से, यूएई 'मिनी इंडिया' है। जिस तरह से दोनों मुल्कों ने मिलकर काम किया है वह एक खास रिश्ता बनाता है।''
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारतीय लोग न केवल यूएई के विकास में योगदान कर रहें है बल्कि भारत को पैसा भेजकर वे वहां के भी आर्थिक विकास में भागीदार बन रहे हैं।'' बावजूद इतना कुछ जानने समझने के आखिर हमारे नीति-नियंता वहां के लोगों की सुरक्षा और यहां से उन्हें एक गिरोह के तहत भेजे जाने पर रोक क्यों नहीं लगा रहे हैं?
आए दिन अखबारों और चंद पन्नों पर किसी दीवार की शोभा बढ़ा रहे विज्ञापन ऐसे ही आकाश को जन्म देते हैं। इन सब के बीच खाड़ी मुल्कों में काम कर रहे लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब वे वहां की जेलों में कैद हो जाते हैं और अपने मदद की गुहार भी नहीं लगा पाते। यहां भी एक बार आंकड़ों की बात कर ही लेते हैं।
मुल्क के बाहर अपने सपने सजोने जाने वाले करीब 2 करोड़ बीस लाख प्रवासियों में से 27 प्रतिशत खाड़ी मुल्कों में काम करने जाते हैं। इनमें भी बड़ा वर्ग उनका है जो अपने ही मुल्क में अनपढ़ है तो वहां जाकर अंग्रेजी और अरबी कहां से सीख लेंगे? खाड़ी के कुल 8 मुल्कों में आज भी करीब 5100 भारतीय वहां की जेलों में कैद हैं। उनका परिवार यहां से दूतावास और मंत्रालयों के चक्कर लगा रहा होता है और हमारी सरकारें आर्थिक और सामरिक समझौतों तक ही सीमित रह जाती हैं।
आज साल 2015 के दिसंबर की 30 तारीख है और अगले साल 9 जनवरी को हम प्रवासी दिवस मनाएंगे। संभवतः कोई रंगारंग कार्यक्रम भी करेंगे, लेकिन इन सब आकाशों से दूर केवल हवा-हवाई और बड़ी-बड़ी बातों के बीच। जिन लोगों के बीच अगला प्रवासी दिवस हमारी सरकार मनाएगी वो या तो बाहर के मुल्कों में किसी कंपनी में बड़े ओहदे पर होंगे या फिर खुद किसी कंपनी के मालिक, लेकिन उस दौरान भी अगर किसी को ऐसे चंद आकाशों की याद आ जाए तो शायद हम उनके बेहतर कल की उम्मीद कर सकते हैं।
संभव है कि आकाश के इतना कुछ करने के बाद उसे अब खाना मिल गया हो, भारतीय दूतावास ने उसे किसी कमरे में जगह दे दी हो और उसके वापस लौटने का प्रबंध भी कर दिया हो लेकिन क्या सिर्फ एक आकाश को बचा लेने से ही सब कुछ हो जाएगा?