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इतिहास में दर्ज न हो सका भारतीय सैनिकों का वो बलिदान

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यिप्रिस की लड़ाई में जर्मन सैनिकों ने भारतीय मोर्चेबंदी को बुरी तरह से धवस्त किया। सिर्फ़ एक भारतीय सैनिक ख़ुदादाद खाँ बच गए। बलूच रेजिमेंट के ख़ुदादाद खाँ को पहला विक्टोरिया क्रॉस मिला। एक भारतीय हवलदार ने कहा, ''लगता है हम नर्क में आ पहुंचे हैं।''
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फ़्लैंडर्स के फ़ील्ड म्यूज़ियम में एक तस्वीर है जिसमें इस गैस के असर को दिखाया गया है। मैदान में चारों तरफ़ लाशें बिखरी पड़ी हैं। इस लड़ाई में 47 सिख रेजीमेंट के 78 फ़ीसदी सैनिक मारे गए थे।

लेकिन एक भारतीय सैनिक मीर दाद ने कई सैनिकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था। उन्हें भी विक्टोरिया क्रॉस दिया गया था।

शहादत को नहीं मिला स्‍थान

पहले विश्व युद्ध में ग्यारह लाख भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए लड़ाई लड़ी थी। इनमें से 60,000 सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। 70,000 सैनिक हमेशा के लिए अपंग हो गए और 9200 सैनिकों को उनकी वीरता के लिए पदक मिले।

लेकिन इतिहास के पन्नों में उनकी बहादुरी को शायद वो जगह नहीं मिली जिसके वो हकदार हैं।

उफ!संघर्ष की इंतहा थी वो

उस रात तिगरिस नदी का पानी किनारों से ऊपर बह रहा था। कोतलाआरा में 6 इंडियन डिवीज़न घेरे में आ गई थी। घिरे हुए सिपाही ज़िंदा रहने के लिए घोड़ों को मारकर खा रहे थे, भूख से बचने के लिए घास उबाली जा रही थी।

53वीं सिख टुकड़ी को ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी कि वो इस घेरे को तोड़ें। उनके सामने 2000 गज़ का फ़ासला था जो चटियल मैदान था। कवर लेने के लिए कोई पेड़ तक नहीं था।

जब तुर्क ठिकाने तक पहुंचने के लिए 1200 गज़ रह गए थे तभी हवलदार अर्जन सिंह ने देखा कि एक ब्रिटिश अफ़सर को गोली लग गई है। उन्होंने उसे कंधे पर उठा कर पीछे की ओर ले गए।

इसके लिए उन्हें इंडिया डिस्टिंग्विश्ड सर्विस मेडल दिया गया। अर्जन के पोते स्क्वाड्रन लीडर राणा तेजप्रताप सिंह छीना बताते हैं कि उनके दादा को उनकी ब्रांडी ने बचाया था।

ब्रांडी सैनिकों के लंबे कोट को कहा जाता था क्योंकि वो उन्हें ब्रांडी की तरह गरम रखता था। जब अर्जन पर फ़ायर आया, उस समय वो ब्रांडी को मोड़ कर अपनी पीठ पर लपेटे हुए थे। गोली लगने से वो गिरे ज़रूर लेकिन गोली उनके पार नहीं जा पाई।

भारतीय परिपेक्ष्य से प्रथम विश्व युद्ध की कहानी अभी तक सुनाई ही नहीं गई है। 1914 से 1919 तक भारत से 11 लाख सैनिक विदेश लड़ने गए। उनमें से 60,000 कभी वापस नहीं लौटे। उनको फ़्रांस, ग्रीस, उत्तरी अफ़्रीक़ा, फ़लस्तीन और मेसोपोटामिया में ही दफ़ना दिया गया।

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कई हो चुके थे निर्बल और अपंग

70,000 लोग वापस ज़रूर आए, लेकिन उनका कोई न कोई अंग हमेशा के लिए जा चुका था। उनको 9,200 से अधिक वीरता पुरस्कार मिले, जिनमें वीरता के सबसे बड़े पदक 11 विक्टोरिया क्रॉस भी शामिल हैं।

इन सैनिकों के अलावा इस लड़ाई में भारत से हज़ारों धोबी, ख़ानसामे, नाई और मज़दूर भी फ़्रंट पर गए थे। इसके अलावा भारत ने आठ करोड़ पाउंड के उपकरण और साढ़े 14 करोड़ पाउंड की सीधी आर्थिक सहायता भी युद्ध कार्यों के लिए दी।

पंजाब में इसे 'लाम' या लंबी लड़ाई कहा गया। ब्रिटेन ने पहली बार भारतीय लोगों को एक सैनिक के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया।

भारत की दृष्टि से देखा जाए तो ये एक आम आदमी की लड़ाई थी जो सिर्फ़ 15 रुपए महीने के लिए अपना घर-बार छोड़ कर विदेश लड़ने गए थे।

'द वीक' पत्रिका की संवाददाता मंदिरा नैयर कहती हैं कि यूरोप की भयानक सर्दी से बचने के लिए उन्होंने नायाब टोटका ईजाद किया था- वेसलीन!

इन सिपाहियों के भेजे मनी ऑर्डर्स ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को बदल कर रख दिया था। हरियाणा अकादमी ऑफ़ हिस्ट्री एंड कल्चर के निदेशक केसी यादव बताते हैं, ''किसानों ने वहाँ से भेजे गए पैसे से ज़मीन ख़रीदी।''

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