भारत और बांग्लादेश के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद अब राष्ट्रविहीन नागरिकों को अपना-अपना आशियाना मिलेगा,इसे लेकर वह खुशी से फूले नहीं समा रहे। मोहम्मद मंसूर अली की सफ़ेद दाढ़ी दोपहर की रोशनी में चमक रही थी, वे एक पीले पड़ रहे कागज पर उंगली रखकर दिखाते हैं।"यह बांग्लादेश है और हमारे चारों ओर यह भारत है।
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"74 साल के अली भारत के पूर्वी प्रांत पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी एन्कलेव (विदेशी क्षेत्र) पुआतूरकुथी में रहते हैं। जो दस्तावेज वो मुझे दिखा रहे हैं, वो 1931 का लैंड रिकॉर्ड है। उस समय वहां अंतिम बार जमीन का सर्वे हुआ था। "तब हम ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा थे। देखिए मेरे पास हमारे परिवार के हक का असली दस्तावेज है, जिस पर सम्राट जॉर्ज पंचम की मुहर लगी है। हमारे पास पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेश के भी दस्तावेज हैं, लेकिन भारत का कोई दस्तावेज नहीं है।"
अली उन तकरीबन पचास हजार नागरिकों में से हैं जो पिछली दो शताब्दियों से चली आ रही इस भौगोलिक विसंगति में रहते हैं। वे जमीन को उन छोटे हिस्सों या एनक्लेवों में रहते हैं जो हैं तो एक देश के, लेकिन बसे हुए हैं दूसरे देश के भीतर।
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ये इनक्लेव 18वीं सदी में राजाओं के समझौतों के कारण अस्तित्व में आए। लेकिन भारत, पाकिस्तान और अंत में बांग्लादेश को आजादी मिलने के बाद भी ये एंक्लेव जैसे थे वैसे ही बने रहे। यहां रहने वाले लोग प्रभावी रूप से राष्ट्रविहीन ही रहे।
ठोकरें खाते रहे
एक और एनक्लेव मोशालदांगा में रहने वाले जैनल आबेदीन कहते हैं, "वे हमें पूरी तरह भूल गए।" जैनल आबेदीन कहते हैं, "हम सालों भारत और बांग्लादेश के बीच फुटबॉल बने रहे, जिसे दोनों देश ठोकरें मारते रहे।"
अब दोनों देशों की सरकारें एनक्लेव की अदलाबदली पर राजी हो गई हैं। यानी भारत में बांग्लादेशी एन्कलेव अब भारत का हिस्सा होंगे और बांग्लादेश में भारतीय एन्केलव अब बांग्लादेश के होंगे। मंसूर अली कहते हैं, "मैंने तीन देशों की आजादी देखी है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश।" "लेकिन हम स्वयं कभी स्वतंत्र नहीं रहे। हमें स्वतंत्र होने में 68 साल और लगे।"
पोतूरकुथी भारत-बांग्लादेश सीमा से सिर्फ सात किलोमीटर दूर है। लेकिन चारों और भारत से घिरे होने की वजह से यहाँ के लोग उस देश नहीं जा सकते जहाँ के वे नागरिक हैं। इसी वजह से उन्हें बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल जैसी सार्वजनिक सेवाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं।
अली कहते हैं, "रात को हम अपने घरों में मिट्टी के तेल से लालटेन जलाते हैं।" जरूरतों के लिए उन्हें एनक्लेव से बाहर जाना पड़ता है, जो अपने आप में एक अलग समस्या है।
आलमगीर हुसैन कहते हैं, "हमारे पास कोई पहचान पत्र नहीं है।" लिहाजा, वे हर समय गिरफ्तारी के डर के साए में रहते हैं क्योंकि उनके पास कोई भी वैध दस्तावेज नहीं है। इसका एक ही समाधान था-धोखाधड़ी से दस्तावेज़ बनवाना है।
आलमगीर कहते हैं, "हम किसी भारतीय को पकड़ते हैं और उससे अपने परिजन होने का नाटक करने के लिए कहते हैं" "ऐसा करके ही हमें स्कूल या अस्पतालों में दाखिले मिलते हैं।" पोतूरकुथी के मुख्य चौराहे पर बैठे लोग चर्चा कर रहे हैं।
भारत और बांग्लादेश के बीच हुए समझौते के नतीजे में यह एनक्लेव शनिवार को भारत में शामिल होने जा रहा है। वे इसी पर चर्चा कर रहे हैं। जैनल आबेदीन कहते हैं, "इतने सालों से हम किसी जंगल में रह रहे थे।" "अब जब हमारा विलय हो रहा है तो हम वो सभी सुविधाएं हासिल करना चाहेंगे जो नागरिकों को मिलती हैं।"
उनकी बात खत्म होते होते लालबत्ती लगी एक गाड़ी आकर वहां रुकती है। वहां गतिविधियां और तेज हो जाती हैं। जिले के अधिकारी कृष्णाभा घोष आए हैं। गांववाले उनके लिए कुर्सी लेकर आते हैं और वो भी बातचीत में शामिल हो जाते हैं। जल्द ही एक ट्रे में चाय भी आ जाती है। वे यहां हस्तांतरण का कामकाज देखने आए हैं।
जिला अधिकारी कहते हैं, "यहां एक समारोह होगा और भारत का झंडा फहराया जाएगा। इस इतिहास को बनते देखना मेरे लिए भी रोमांचक है।" लेकिन गाँव वालों के पास चर्चा करने के लिए कुछ और बड़े मुद्दे हैं। एक पूछता है, "हमें अपने पहचान पत्र कब तक मिलेंगे?"
वे अधिकारी से पूछते हैं, "स्कूल कब तक बनेगा और बिजली कब तक आएगी ?" घोष उनसे उनकी मांगों की सूची बनाने के लिए कहते हैं और दोबारा लौटने का वादा करते हैं। अब वे भी उनकी ज़िम्मेदारी का हिस्सा हैं।
एनक्लेव के स्कूल के भीतर बच्चों का एक समूह भारत के राष्ट्रगान का अभ्यास कर रहा है। वे अभी इसमें पारंगत नहीं है और शिक्षकों की मदद से रट रहे हैं। आँखों में चमक लिए बच्चों की ओर इशारा करते हुए मंसूर अली कहते हैं, "मेरे पूर्वज चले गए, मैं भी चला जाऊंगा लेकिन कम से कम ये तो आजाद रहेंगे।" "इनके पास नागरिकों के सभी अधिकार होंगे। ये एक सम्मानजनक पहचान के साथ जी सकेंगे।"