हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि चुनाव खर्च का सही ब्यौरा न देने वाले प्रत्याशी को चुनाव आयोग अयोग्य घोषित कर सकता है। '
ऐसा करने में आयोग की शक्तियां और वैधानिक नियम कहीं बाधा नहीं हैं।
कोर्ट ने बिसौली विधानसभा सीट से 2007 के चुनाव में निर्वाचित प्रत्याशी उमलेश यादव को तीन वर्ष के लिए अयोग्य करार देने के आयोग के निर्णय को सही करार दिया है।
डीपी यादव की पत्नी उमलेश यादव ने चुनाव आयोग के 20 अक्टूबर 2011 के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका पर न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति भारती सप्रू की खंडपीठ ने सुनवाई की।
न्यायालय ने कहा कि प्रत्याशी द्वारा दिए चुनाव खर्च के ब्यौरे से निर्वाचन अधिकारी का संतुष्ट होना आवश्यक है। ब्यौरा संतोषजनक नहीं होने पर आयोग को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 10 (अ) के तहत प्रत्याशी को अयोग्य घोषित करने का अधिकार है।
याची की ओर से धारा 10 (अ) की वैधानिकता पर सवाल उठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता रविकांत का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 192 में प्रत्याशी को अयोग्य घोषित करने का राज्यपाल को अधिकार है।
धारा 10 (अ) के प्रावधान अनुच्छेद 192 के विरोधाभासी हैं। सर्वोच्चता संविधान की है इसलिए 10 (अ) को अवैध और असंवैधानिक घोषित किया जाए।
कोर्ट का मानना था कि कि 10 (अ) अनुच्छेद 192 के विपरीत नहीं है क्योंकि चुनाव आयोग के पास स्वतंत्र अधिकार है। वह चुनाव खर्च का संतोषजनक ब्यौरा न देने वाले प्रत्याशी या अन्य को अयोग्य करार दे सकता है।
कोर्ट ने याची के अधिवक्ता की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि राज्यपाल द्वारा संदर्भित करने पर ही चुनाव आयोग कदम उठा सकता है।
प्रकरण के अनुसार उमलेश यादव ने वर्ष 2007 में बिसौली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। जीतने के बाद उन्होंने चुनाव खर्च का ब्यौरा दाखिल किया। इसमें दो समाचार पत्रों में छपे विज्ञापन का ब्यौरा नहीं दिया गया था।
चुनाव आयोग द्वारा पूछे जाने पर याची का उत्तर संतोषजनक नहीं पाया गया। इस आधार पर उसे अयोग्य करार दे दिया गया।