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जाट आरक्षण रद्द, यूपी की राजनीति पर क्या होगा असर?

Wed, 18 Mar 2015 12:47 PM IST
नितिन यादव/अमर उजाला, मेरठ
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वेस्ट यूपी की राजनीति में जाट समाज का दखल हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। किसान आंदोलन हों या दूसरे सामाजिक फैसले, उनमें जाट समाज की मजबूत छाप देखने को मिलती रही है। ऐसे में जाट आरक्षण रद्द होने का पश्चिम की राजनीति पर व्यापक असर पड़ेगा।
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खास बात यह है कि आरक्षण दिलाने का श्रेय लेने के बावजूद वोटों में मात खाए चौधरी अजित सिंह के लिए आरक्षण रद्द होना सियासी संजीवनी साबित हो सकता है। अभी तक गन्ना भुगतान और भूमि अधिग्रहण के सहारे लड़ रही रालोद अब इस मुद्दे को बड़े स्तर पर लाकर पश्चिम की राजनीति में बड़ा परिवर्तन लाने की मुहिम में लग गई है।

अब यह साफ है कि रालोद जाट आरक्षण रद्द होने को एक अवसर के तौर पर लेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से मिले नुकसान की भरपाई के लिए चौ. अजित सिंह इस मुद्दे को खोई राजनैतिक ताकत पाने के लिए इस्तेमाल करने में कसर नहीं छोड़ना चाहेंगे।
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भाजपा की ओर चले गए जाट वोटर

लोकसभा चुनावों में मुजफ्फरनगर दंगों के असर के कारण जाट वोटर काफी संख्या में भाजपा की ओर चला गया था। इसमें युवाओं की संख्या ज्यादा थी। पश्चिम के जिलों में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत, सहारनपुर, शामली, बिजनौर, जेपी नगर, गौतमबुद्धनगर, रामपुर, बरेली, पीलीभीत, मुरादाबाद और हापुड़ सहित आगरा, मथुरा और अलीगढ़ की बेल्ट तक जाटों का अच्छा खासा दखल है।

देश में 65 लोकसभा सीटों पर जाट असरद्दार हैं। वेस्ट यूपी में पांच दर्जन से ज्यादा सीटों पर जाट वोटर निर्णायक की स्थिति में हैं। कई सीटों पर इनकी संख्या 20 से 25 फीसदी तक है। उत्तर प्रद्देश में रालोद के विधायकों की संख्या घटी तो रालोद ने लोकसभा चुनाव में बेहतर उपस्थिति के लिए यूपीए सरकार से जाट आरक्षण का दांव खेला।

मेरठ और बागपत में आरक्षण के बाद हुई रैली में जब भारी भीड़ उमड़ी थी तो ऐसा लगा कि चौ. अजित सिंह बेहतर प्रद्दर्शन करेंगे। हालांकि, लोकसभा चुनावों में न तो चौ. अजित सिंह बागपत में अपना गढ़ बचा पाए और न ही उनके बेटे जयंत चौधरी को मथुरा में सफलता मिली।

जाट वोटरों में फिर से पैठ बनाने में लगा रालोद

भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पश्चिम में बागपत से मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह, मुजफ्फरनगर से संजीव बालियान, बिजनौर से कुंवर भारतेंद्र, मथुरा से हेमा मालिनी और फतेहपुर सीकरी से बाबूलाल जैसे जाट नेताओं पर दांव चला तो चौ. अजित सिंह का आरक्षण का दिलाने का फैसला चुनावी फायदे में नहीं बदल पाया।

आरक्षण से युवाओं को ज्यादा लाभ होने की बात कही जा रही थी, लेकिन रालोद का युवा वोटर ही ज्यादा भाजपा की ओर खिसका। अब आरक्षण रद्द्द होने के बाद रालोद इसे भावनात्मक मुद्दा बनाकर उस युवा वोटर को फिर से अपनी ओर लाने का प्रयास करेगी। रालोद नेताओं ने इसे दुख का समय बताया तो मेरठ पहुंचे जयंत चौधरी ने यहां तक कह दिया कि दुख की इस घड़ी में वे समाज को हर सहारा देने के लिए तैयार हैं।

वहीं रालोद नेता कह रहे हैं कि भाजपा के जाट नेताओं को नैतिकता के आधार पर समाज के साथ खड़ा होना चाहिए। हालांकि, भाजपा के जाट नेता कह रहे हैं कि यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला है और पार्टी अब अपनी ओर से नए सिरे से पैरवी करेगी। दरअसल, वोटों की इस राजनीति में पूरा पिछड़ा वर्ग अहम है। राजनैतिक दल जाटों के आरक्षण के साथ इस बात की भी गणना कर रहे हैं कि दूसरी पिछड़ी जातियों में इसका क्या असर होगा।

रालोद भी जाटों को अपने साथ तो लाना चाहती है, लेकिन सारे पिछड़ों की बात कहकर इसे बड़े स्तर की लड़ाई का रूप दे रही है। जयंत ने इसीलिए साफ किया कि यह पूरे पिछड़ा वर्ग का नुकसान है। जाट आरक्षण के इस मुद्दे पर नजर बस रालोद की ही नहीं है, जबकि दूसरे दल भी इस पर पैनी निगाह रखे हुए हैं। सपा, बसपा और कांग्रेस भी भाजपा के जाट वोटरों के खिसकने से अपनी जमीन मजबूत करने पर निगाह रखे हुए हैं।

जाटों की ताकत
- देश में जाट समाज की आबादी लगभग आठ करोड़ (हिंदू, मुस्लिम और सिख जाट समेत)।
- अकेले हिंदू जाटों की संख्या छह करोड़।
- 65 लोकसभा सीटों पर असरद्दार, 132 लोस सीटों पर है मौजूदगी।
- वेस्ट यूपी की लगभग 65 विधानसभा सीटों पर जाट वोटर निर्णायक भूमिका में। लगभग 90 सीटों पर मौजूदगी।
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65 साल में मिला, एक साल में छिना

केंद्रीय सेवाओं में जाटों को आरक्षण मिलने में 65 साल लगे। लंबा संघर्ष हुआ। रास्ते रोके गए। रेल रोकी गई। दिल्ली का पानी तक रोका गया। सड़क से संसद तक हंगामा चला। दो युवकों की जान चली गई। तब जाकर दो मार्च 2014 को जाटों को यह लाभ मिला था, लेकिन एक साल में ही सुप्रीम कोर्ट में जाट आरक्षण रद्द हो गया। वजह कुछ भी रही हो, लेकिन आंदोलन करने वाले लोगों में मायूसी है।

अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अनुसार 13 फरवरी 2010 को आंदोलन के दौरान हरियाणा के हिसार में युवक सुनील श्योरान की जान गई। फिर छह मार्च 2012 को भी हरियाणा में ही एक अन्य युवक की संघर्ष में जान चली गई। जाटों ने आरक्षण के लिए बस, ट्रेन, पानी रोका।

कामनवेल्थ गेम्स के दौरान खेल गांव की ओर जाने वाले रास्ते रोके गए थे। इतने संघर्ष के बाद केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण मिलने पर किसी ने नहीं सोचा था कि दो मार्च 2014 को मिली सौगात साढ़े 12 महीनों में 17 मार्च 2015 को छिन जाएगी।
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