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दवाओं के परीक्षण से हो रही मौत पर सरकार बेफिक्र

Thu, 03 Jan 2013 08:44 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र सरकार को बुरी तरह फटकार लगाई है। बृहस्पतिवार को सर्वोच्च अदालत ने कहा कि बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां बिना किसी रोक-टोक के भोले-भाले लोगों पर दवाओं का प्रयोग कर रही है और सरकार सोई हुई है।
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गैरकानूनी तरीके से किए जा रहे परीक्षण बच्चों और गरीब लोगों की मौत की वजह बन रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि दवा कंपनियां सरकार की लापरवाही के कारण देश को बर्बादी की ओर ढकेल रही हैं।

जस्टिस आरएम लोढा और जस्टिस अनिल दवे की पीठ ने बृहस्पतिवार को कहा कि सरकार इन कंपनियों की ओर से गैरकानूनी तरीके से किए जा रहे परीक्षणों के गोरखधंधे को रोकने के लिए समुचित तंत्र स्थापित करने में विफल रही है।
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पीठ ने निर्देश दिया कि देश में अब सभी दवाओं के परीक्षण केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की देखरेख में होंगे। सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि देश के नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना सरकार का काम है। अवैध परीक्षणों की रोकथाम का दायित्व भी सरकार का है। मौत पर अंकुश पाना ही होगा और गैरकानूनी परीक्षण रोकना होगा। सरकार को तत्काल इस समस्या से निपटना होगा।

पीठ ने सरकार के ढीले रवैये पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार गहरी नींद में है। यह जानकर हमें दुख होता है कि ये कंपनियां हमारे देश के बच्चों को बलि का बकरा बना रहीं हैं। सरकार संसदीय समिति का भी सम्मान नहीं करती, जिसने इन कंपनियां के गोरखधंधा की बात कही है। इस गंभीर समस्या पर सरकार अदालत में नियमों का प्रारूप दिखा रही है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि केंद्र सरकार इस संबंध में नियम बनाने पर विचार कर रही है। पीठ ने कहा कि अनियंत्रित तरीके से हो रहे ये परीक्षण देश में बर्बादी ला रहे हैं। इस मामले में कहीं न कहीं सरकार की जिम्मेदारी की झलक नजर आनी चाहिए।

पीठ ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि सरकार अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए वापस आ सकती है, लेकिन ऐसे परीक्षणों में जान गंवाने वाले लोगों का क्या होगा। जान गंवाने वाले तो वापस नहीं आ सकते हैं। समिति और आयोग गठित करना बहुत आसान है। यह तो सिर्फ मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने के लिए किया जाता है। महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान हटाने का यह सबसे अच्छा तरीका है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें पिछले 21 माह के दौरान किसी एक समिति के ही कामकाज का विवरण दिया जाए। हमने आपको कई मौके दिए हैं, लेकिन आपके अधिकारी उस तरह से काम ही नहीं करते जैसे उन्हें करना चाहिए। यदि आपके पास ठोस व्यवस्था होती तो हमें इसमें हस्तक्षेप ही नहीं करना पड़ता।

पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार का हलफनामा पिछले आदेश के अनुरूप नहीं है। अदालत ने सरकार की ओर से दायर हलफनामा अस्वीकार करते हुए स्वास्थ्य सचिव या इस संस्था के महानिदेशक को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इस पर एएसजी ने अधिकारियों के बीच संवाद में कहीं कमी रहने का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में नया हलफनामा दाखिल किया जाएगा।
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