किशोर न्याय अधिनियम को अगर सुप्रीम कोर्ट समाप्त भी कर देता है, तब भी इस आदेश से दिल्ली गैंगरेप में शामिल किशोर के मामले पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह खुद सुप्रीम कोर्ट का कहना है जिसका स्पष्ट मतलब यह है कि किसी भी न्यायिक आदेश को पहले घटित हो चुके आपराधिक मामले में नहीं लागू किया जा सकता।
चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने बृहस्पतिवार को जेजे एक्ट के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर अपना यह रुख स्पष्ट किया। इस याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग पर पीठ ने कहा कि यदि आज हम इस अधिनियम को खत्म करने का आदेश जारी कर दें, तब भी यह आदेश दिल्ली गैंगरेप में शामिल किशोर के मामले में लागू नहीं होगा। कोई भी आदेश पिछली तिथि से लागू नहीं होता है।
यह टिप्पणी पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता की उस दलील पर की, जिसमें कहा गया कि दिल्ली गैंगरेप मामले में ट्रायल शुरू होने वाला है। यदि तत्काल इस याचिका पर आदेश नहीं जारी किया गया तो दोबारा से पूरी प्रक्रिया निभाए जाने का जोखिम रहेगा।
पीठ ने याचिका पर जल्द सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा कि सूचीबद्ध होने पर इस मसले पर अदालत विचार करेगी। याचिका में कहा गया है कि बर्बर और खतरनाक अपराध को अंजाम देने वाले नाबालिगों को जेजे एक्ट के प्रावधानों का लाभ नहीं मिलना चाहिए क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। इसमें दिल्ली गैंगरेप मामले में शामिल किशोर के खिलाफ सामान्य आरोपियों की तरह ही मामला चलाए जाने की मांग की गई है।
मालूम हो कि सर्वोच्च अदालत इस अधिनियम में संशोधन की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से 18 जनवरी को जवाब तलब कर चुकी है। याचिकाकर्ता ने गुजारिश की है कि अदालत अपनी शक्ति से इस किशोर को कानून में तय की गई सजा से ज्यादा सजा दिलाए क्योंकि यह किशोर समाज के लिए खतरा है।