अगर मोहनदास करमचंद गांधी के माने में इंटरनेट और सोशल मीडिया होता तो भारत छोड़ो आंदोलन के पहले दिन वो क्या ट्वीट करते? उनका ट्वीट केवल तीन शब्दों में होता: अंग्रेजी में "डू ऑर डाई" और हिंदी में "करो या मरो"।
ज़रा सोचिए, ये तीन शब्द कितने प्रभावशाली साबित होते और इसे शायद लाखों बार री-ट्वीट किया जाता।
या फिर उनके आंदोलन का ये नारा: "क्विट इंडिया" या "भारत छोड़ो"।
इसी पैग़ाम को वो अपने फ़ेसबुक के टाइम-लाइन पर कुछ इस तरह से अपडेट करते: "मैं आपको एक छोटा सा मंत्र देता हूं। आप इसे अपने दिमाग़ में बसा लीजिए और आपकी हर सांस आपकी भावनाओं को अभिव्यक्त करे। ये मंत्र है, करो या मरो"।
इसे कितना शेयर मिलता? इसका अंदाज़ा लगाना भी बेमानी है। और हां, वो कौन सी तस्वीर पोस्ट करते?
कितने लाइक मिलते?
उस वक़्त की एक तस्वीर है जिसमें गांधीजी कांग्रेसी नेताओं के बीच बैठे हैं और जिसमें सभी नेताओं की निगाहें उनकी तरफ टिकी हुई हैं, मानो वो उनके नेतृत्व का इंतज़ार कर रहे हैं।
इसे लाखों लोग लाइक करते।
उस समय गांधीजी स्वतंत्रता की मंज़िल के क़रीब नहीं थे, लेकिन शायद अगर वो ज़माना ट्विटर या फ़ेसबुक का होता तो आज़ादी वर्ष 1947 से कहीं पहले मिल जाती।
ठीक 9 अगस्त की सुबह गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन का नारा बुलंद कर दिया था।
अगली सुबह महात्मा गांधी और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस उन्हें सुबह उनके घर गिरफ्तार करने आई थी।
टूट जाते सारे ट्रेंडों के रिकॉर्ड
जरा सोचिए उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर किस तरह से वायरल होती। शायद ये ख़बर दुनिया भर में सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग और वायरल के रिकॉर्ड तोड़ देती।
उनकी गिरफ्तारी के बाद हिंसा भड़क उठी थी। शायद उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर पारंपरिक मीडिया के बजाय सोशल मीडिया पर सब से पहले ब्रेक होती।
कहा जाता है कि उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर देश के गांवों और पिछड़े इलाक़ों में काफी विलम्ब से पहुंची।
ज़ाहिर है अगर वो सोशल मीडिया और इंटरनेट का युग होता तो ये ख़बर मिनटों में देश भर में पहुंचती।
और शायद हिंसा जो भड़की थी वो पूरे देश में फैल जाती जिस पर काबू पाने में ब्रिटिश राज नाकाम रहता।
नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता सोशल मीडिया का जिस तरह प्रभावशाली तरीके से इस्तेमाल करते हैं यह सब को पता है।
अगर आज महात्मा गांधी ज़िंदा होते तो वो सोशल मीडिया पर हर जगह छाए रहते।
आम लोगों के मुद्दे
लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें किसी आंदोलन को चलाने के लिए ट्विटर और फेसबुक की ज़रूरत नहीं पड़ती।
उन्हें सोशल मीडिया की स्ट्रैटजी की भी ज़रूरत नहीं पड़ती।
मगर मेरे विचार में गांधी जी सोशल मीडिया का पूर्णरूप से इस्तेमाल करते। वो प्रभावी संचार के फायदों से वाक़िफ़ थे।
अगर आप हर उस मुद्दे पर एक नज़र डालें जिसको लेकर उन्होंने आंदोलन शुरू किया तो साफ़ समझ में आएगा कि वो आम लोगों से जुड़े मुद्दे उठाते थे।
नील का मामला हो या नमक का या फिर अन्य आंदोलन हों। ये सभी मुद्दे आम लोगों से जुड़े थे। इस कारण वो देश भर में सबसे लोकप्रिय नेता बन गए।
इस तरह फैलती हत्या की खबर
महात्मा गांधी की हत्या आज ही के दिन, 30 जनवरी 1948 में हुई थी। ज़रा सोचिए उनकी हत्या की ख़बर सोशल मीडिया पर किस तरह से फैलती। शायद इनके सर्वर ही बैठ जाते।
लेकिन ऐसा नहीं है कि वो ट्विटर या फेसबुक या इंस्टाग्राम पर नहीं हैं।
उनकी हत्या के 68 साल हो गए लेकिन आप उनके नाम और उनके भाषणों और उनकी तस्वीरों को हर सोशल मीडिया पर देख सकते हैं।