मंदिरों से जब ये एलान होने लगे कि किसने अपने घर में क्या खाया था, तो जरा फिक्र होती ही है। प्रधानमंत्री जब खामोश तमाशाई बने देखते रहें तो जरा डर लगता ही है। लोग जब ये कहें कि दादरी में जो हुआ वह अफसोसजनक था तो यह पूछने का दिल करता है कि क्या वास्तव में आपको भी अफसोस हुआ?
यह सवाल भी दिल में आता ही है कि राजनेता अब भी सबक सिखाने की बात कर रहे हैं, क्या उन्हें लगाम देने की ताकत किसी में नहीं? या कोई देना नहीं चाहता?क्या कोई पैगाम पहुंचाने की कोशिश की जा रही है? मानने में झिझक जरूर होती है लेकिन डर लगता है।
अपने लिए नहीं, तो बच्चों के लिए और जब लोग यह कहते हैं कि ज्यादातर हिन्दू भी अच्छे हैं और मुसलमान भी, तो इससे कोई हौसला नहीं मिलता।