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अचानक आया पानी, किया यूं बाढ़ का सामना...

Wed, 19 Jun 2013 11:05 AM IST
राकेश/दरभंगा/इंटरनेट डेस्क।
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उत्तर भारत इन दिनों पानी के कहर से जूझ रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बादल फटने और तेज बारिश ने कई नदियों में बाढ़ ला दी है। लोगों में अफरा-तफरी है।
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लेकिन इस मुश्किल वक्त में भी दिमाग से काम लिया जाए, तो नुकसान कम किया जा सकता है। करीब 9 साल पहले बिहार में आई बाढ़ का सामना इस लेखक ने भी किया। उन कठिन हालात का मुकाबला कैसे किया, यह अपने पाठकों से साझा कर रहे हैं।

सुबह के करीब चार बजे थे, मैं सो रहा था। मां की आवाज ने चौंका दिया 'उठो पानी आ गया है...।' अधखुली आंखों से उठा और पांव जमीन पर रखा ही था कि छपाक की आवाज आयी।
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तस्वीरों में: उफान पर यमुना

अब नींद गायब थी। ये क्या...घर में चारों चारों तरफ पानी ही पानी था। मेरी चप्पल तैर रही थी। मुझे लगा कि रात में खूब बारिश हुई और घर में पानी भर गया, लेकिन जब कमरे से बाहर निकला तो देखा अफरा-तफरी मची हुई है। लोग जरूरी सामान और बच्चों को कंधे पर उठाए कमर तक पानी में तैरते हुए सुरक्षित ठिकाने की तलाश में भाग रहे हैं।

माजरा समझते देर न लगी कि बाढ़ आ गई है। दरअसल कमला नदी का बांध टूट जाने से कमला और बागमती दोनों का मिलन हो गया था और मेरे घर के दरवाजे के पास पानी की मानो नदी सी बह रही थी।

काफी जतन के साथ दीवार पकड़कर आंगन में पहुंचा। उधर मां अनाज और जरूरी सामान को घर पर बने छज्जे पर पहुंचा रही थी। मैं भी मदद करने पहुंचा और सामान को छज्जे पर जमाने लगा।

तस्वीरों में: आसमान से बरसी आफत

इधर पानी तेजी से बढ़ रहा था। एक काम निपटाते निपटाते कमरे में कमर तक पानी भर चुका था। हालांकि पूरे परिवार ने सामान को बचाने की हर संभव कोशिश की।

मेरे पिता जी को गाय पालना पसंद था, लेकिन आज गाय पालने का ये शौक भारी पड़ रहा था। सामान तो ज्यों त्यों ठिकाने लगा दिया पर गाय को कहां ठिकाने लगाए ये चिंता खाए जा रही थी।

जब अक्ल जवाब दे गई तो आनन फानन में गाय को भी छत पर चढ़ाने की योजना बना डाली। बढ़ते पानी को देखकर गाय भी खतरा समझ गयी थी सो हमारी कवायद में सहयोग करती हुई तेजी से सीढ़ियां चढ़ छत पर पहुंचीं।

नीचे के पानी से तो बच निकले लेकिन ऊपर इंद्र मानों क्रोधित हो रहे थे। घर में अनाज सूखने के लिए मां बड़ा सा प्लास्टिक रखा करती थी। उस दिन इस प्लास्टिक को हमने जैसे तैसे टांग दिया और सभी लोग इसके अंदर बैठ गये।

विडंबना देखिए, पांच कमरों में रहने वाला पांच लोगों का परिवार उस वक्त प्लास्टिक के नीचे दुबक कर बैठा था।

आंखों देखी: केदारनाथ में क्या हुआ, कैसे मची तबाही?

बाढ़ आने पर पीने के पानी की सबसे अधिक दिक्कत होती है हमारे साथ भी ऐसा हुआ। हैंड पंप पानी में समा गया था। लेकिन हम लोगों ने दो तीन बाल्टी पानी भरकर रख लिया था। अब यही हमारा जीवन आधार था।

अगर इस पानी से खाना बनाने लगते तो पीने के लिए पानी की दिक्कत हो जाती। इसलिए खाना बनाने के लिए बाल्टी में रस्सी बांधकर घर के नीचे बह रहे बाढ़ के पानी को ऊपर खींचा। मां ने इसे अच्छी तरह उबाला और सूती कपड़े से पानी छानकर चावल पकाया गया।

बाढ़ कब तक रहेगी इसका कोई अंदाजा नहीं था। इसलिए खाने के बाद दो-दो घूंट पानी पीकर हमने गले को तर कर लिया। दिन किसी तरह बीता और रात आयी। वर्षा बंद हो चुकी थी और लोगों ने थोड़ी राहत ली। लेकिन बिजली नहीं थी। इंवर्टर से लाइट जलाते तो बैटरी जल्दी खत्म हो जाती, इसलिए हमने सीधे बैटरी से ही लाइट जलाई।

वो रात सभी लोगों ने जागकर बिताई। करीब एक हफ्ते तक गाय और हम सभी लोग छत पर आश्रय लेकर बैठे रहे। हर दिन बाढ़ के पानी से खाना बनता और दो घूंट पानी पीकर गला तर होता। गाय को भूसा और खाना मिल रहा था इसलिए वह भी छत पर से बाढ़ का नजारा ले रही थी।
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तो देखा आपने किस तरह हमारे पूरे परिवार ने एक सप्ताह तक बाढ़ का दंश झेला।

अगर आपने भी बाढ़ को करीब से देखा है और इसका सामना किया है तो अपने अनुभव हमारे साथ बांटे। हम आपके अनुभव को अपनेपाठकों से साझा करेंगे।
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