यूपीए-2 की चौथी सालगिरह के जश्न की दावत में न जाकर सपा ने केंद्र सरकार से खुद को दूर दिखाने की कोशिश की है। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार सपा केंद्र से कितना दूर जाएगी।
सरकार खाद्य सुरक्षा बिल और भूमि अधिग्रहण विधेयक समेत तमाम कई मुद्दों मदद के लिए सपा को साधने की जुगत में है। लिहाजा, सियासी मजबूरियों को देखते हुए सपा के लिए यूपीए सरकार से लंबे समय तक दूरी बनाना बेहद मुश्किल होगा।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर सपा के आला नेता यूपीए सरकार पर निशाना साध रहे हैं। सपा नेता खुलकर कह रहे है कि पार्टी अब यूपीए सरकार की मदद नहीं करेगी। मगर अंदरखाने इसे चुनावी कसरत से ज्यादा बढ़कर नहीं माना जा रहा।
यूपीए के चार साल पूरा होने के जश्न में शामिल नहीं होने के पीछे सपा ने तर्क दिया था कि वे पाप में भागीदार नहीं बनना चाहते। सपा के इस जवाब से यूपीए के मैनेजर आहत हैं।
इस बात को लेकर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से भी कांग्रेस के कुछ आला नेताओं ने बात की है। दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को घेरने की शुरुआत कर दी है।
उन्होंने कहा है कि अखबारों और टीवी पर विज्ञापन देखकर लग रहा है कि कांग्रेस चुनाव के लिए तैयार हो गई है। सपा ने यूपीए सरकार और कांग्रेस पर जवाबी हमले शुरू कर दिए है।
मगर सपा के उच्च पदस्थ सूत्र मानते हैं कि भले ही दावत से दूरी बनाई हो मगर सपा का यह हमला यूपीए से पूरी तरह से संबंध विच्छेद करना नहीं है।
यूपीए सरकार से समर्थन वापस नहीं लेने पर भी सपा हाईकमान कोई विचार नहीं कर रहा है। साथ ही खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण बिल को पारित करने के लिए सरकार सपा को मना रही है। इन दोनों बिलों पर यूपीए को सपा की मदद की सख्त जरूरत है।
वहीं सपा अपने समर्थन की एवज में भाव तोल तो कर सकती है, मगर उसके लिए सीधे न कहना भी आसान नहीं है। इसलिए आने वाले दिनों में सपा यूपीए सरकार के खिलाफ अपने कड़े रुख को लेकर एक बार फिर यूटर्न ले सकती है।
बसपा के यूपीए के साथ बने रहने की वजह से भी सपा एक दम से राजनीतिक सख्ती नहीं दिखा पा रही है।