आरटीआई एक्ट के तहत जानकारी मांगने वाले आवेदक से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने जवाब देने की बजाय उलटा सवाल कर डाला कि आखिर यह सूचना आपके किस काम की है।
पीएमओ के जनसंपर्क अधिकारी ने सूचना देने से इंकार कर दिया, वह भी तब जब उनके वरिष्ठ अधिकारी ने सूचना देने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने आरटीआई कार्यकर्ता कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश बत्रा से स्पष्टीकरण मांगा कि आखिर उक्त जानकारी उनके लिए निजी, सामाजिक या राष्ट्रीय रूप में किस प्रकार उपयोगी है।
बत्रा ने पीएमओ से उन फाइलों और रिकॉर्डों का ब्योरा मांगा था जिसे आरटीआई एक्ट की धारा 4 (1) के तहत डिजिटल एवं कम्प्यूटरीकृत करना अनिवार्य है।
अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने की बजाए सीपीआईओ एसई रिजवी ने सूचना देने से इंकार करते हुए कहा कि मांगी गई सूचना उस श्रेणी में आती है, जहां याचिकाकर्ता ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि जानकारी उसके लिए निजी, सामाजिक या राष्ट्रीय रूप में किस तरह से उपयोगी है।
सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदक को सूचना मांगने के लिए कोई कारण देने की जरूरत नहीं होती है। कानून के मुताबिक, सूचना देने से तभी मना किया जा सकता है, जब यह पारदर्शिता कानून के छूट के तहत आता हो।
आरटीआई एक्ट की धारा 4 (1) (ए) में कहा गया है कि प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकार को सभी रिकार्डों को सूचीबद्ध करके ऐसे रखना चाहिए कि जो आरटीआई कानून के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद करे।
उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी रिकार्ड कम्प्यूटरीकृत हों और देश में विभिन्न प्रणालियों से एक नेटवर्क के जरिये जुड़ा हुआ हो ताकि रिकार्ड आसानी से मिल सके। पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त एएन तिवारी ने इस संबंध में कहा कि सीपीआईओ यह नहीं पूछ सकते कि आरटीआई आवेदकों के लिए सूचना किस प्रकार से उपयोगी है।