1987 में मेरठ के हाशिमपुरा दंगा मामले में बुधवार को जिरह पूरी हो गई। अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद तीस हजारी अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। 42 लोगों के अपहरण और हत्या के मामले में गाजियाबाद के सिविल लाइन थाना पुलिस ने पीएसी के 19 अधिकारियों और कर्मियों को आरोपी बनाया था।
इनमें से पीएसी के कंपनी कमांडर सुरेंद्र पाल सिंह समेत तीन आरोपियों की मौत हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मामले की सुनवाई दिल्ली ट्रांसफर हुई थी। बुधवार को पीड़ित बाबूद्दीन के अधिवक्ता जुनैद खान ने कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कीं।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने यूपी सरकार के विशेष अधिवक्ता सतीश टमटा व अकबर आबिदी और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने सभी पक्षों से दस दिनों के भीतर अपनी लिखित दलील पेश करने को कहा है।
पीएसी के 19 कर्मियों को बनाया गया था आरोपी
अभियोजन के मुताबिक 22 मई 1987 को पीएसी के जवानों ने हाशिमपुरा इलाके से 42 लोगों को अगवा करने के बाद रात के अंधेरे में गोलियों से भून दिया और शवों को गंग नहर और हिंडन नदी में फेंक दिया। इनमें से कुछ शव मिल ही नहीं पाए।
वहीं बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपियों का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। दंगों के दौरान हाशिमपुरा में सेना, स्थानीय पुलिस और पीएसी के जवान थे।
अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा है हाशिमपुरा से लोगों को पीएसी के जवानों ने ही अगवा कर उनकी हत्या की।
ये था मामला
मामला 1987 में मेरठ के हाशिमपुरा और जुम्मनपुरा के 42 लोगों की बर्बर हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष ने जिंदा बचे पांच पीड़ितों, मृतक के परिजनों डॉक्टर व अन्य गवाहों, ट्रक की एफएसएल रिपोर्ट का हवाला देते हुये कहा पीएसी के जवानों ने हत्या की मंशा से पीड़ितों को पीड़ितों को अगवा किया।
गोलीबारी के बाद जिंदा बचे जुल्फीकार, मोहम्मद नईम, मोहम्मद उस्मान, मुजीबुर्रहमान, बाबूद्दीन के बयानों को हवाला देते हुए कहा पीएसी ने हत्या की मंशा के समुदाय विशेष के लोगों को अगवा किया और गोली मारकर गंग नहर व हिंडन नदी में फेंक दिया।
इनमें से पांच लोग जिंदा बच गये जिनके बयानों के आधार पर गाजियाबाद पुलिस ने यह मामला दर्ज किया था। अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दंगा, आपराधिक साजिश, हत्या, हत्या की मंशा से अपहरण, हत्या का प्रयास व साक्ष्य नष्ट करने संबंधी धाराओं में आरोप तय किये थे।