गुजरात विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई जिन तीन सूरमाओं के बीच है, इत्तेफाक से वे सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक की पौध हैं, जो कभी साथ बैठकर भाजपा को इस प्रदेश में स्थापित करने का ताना-बाना बुनते थे।
इनमें पहला नाम नरेंद्र मोदी का है, जिन्हें स्थानीय लोग ‘नमो’ भी कहते हैं। सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए वह विकास और सात करोड़ गुजरातियों की अस्मिता को मुद्दा बनाकर मैदान में हैं तो दूसरी तरफ हैं कांग्रेस के शंकर सिंह बाघेला, जो यहां ‘बापू’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रदेश में वह कांग्रेस के सबसे बड़े खेवनहार हैं।
राज्य में तीसरी ताकत बनने की जुगत में चुनावी अखाड़े में उतरी गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) की अगुवाई केशुभाई पटेल कर रहे हैं, जिन्हें लोग ‘बप्पा’ कहते हैं।
ये तीनों नेता संघ की पौध रहे हैं, जिन्होंने यहां पार्टी को सींचने के लिए कभी साथ-साथ खून पसीना बहाया। लेकिन इस बार गुजरात की लड़ाई में सभी आमने-सामने हैं। यह भी कहा जा सकता है कि गुजरात में इस बार वास्तविक लड़ाई संघ बनाम संघ हो गई है, जो तीन खेमों में बंटी नजर आ रही है।
प्रदेश में स्वयंसेवकों की कतार भाजपा और मोदी के साथ खड़ी है तो प्रदेश के लालजी भाई और डामले सरीखे संघी खुल्लम खुल्ला केशुभाई के साथ हैं। शंकर सिंह वाघेला को बनवासी स्वयंसेवकों का समर्थन प्राप्त है।
वैसे राज्य के भविष्य का पता तो 20 दिसम्बर को मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन यह तय है कि सूबे की कमान एक बार फिर संघ के किसी स्वयंसेवक के हाथ ही रहेगी, चाहे वह मोदी हों, केशुभाई हों या फिर वाघेला।