विदेशों में कार्यरत उच्च स्तरीय भारतीय वैज्ञानिकों को अपने देश के संस्थानों में कुछ समयावधि के लिए बुलाने को सरकार ने योजना तैयार की है। सरकार इसके लिए भारी खर्च करने को तैयार है ताकि इन वैज्ञानिकों को लुभाया जा सके।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने सरकार के वैज्ञानिक विभाग के सचिवालय को इस प्रस्ताव का वैचारिक नोट भेजा है। उन्होंने विज्ञान विभाग के सचिवों को मंगलवार को इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए बैठक करने को बुलाया है।
इस 'नेशनल जवाहर लाल नेहरू साइंस फेलोशिप' योजना के तहत वैज्ञानिकों को एक से तीन साल के लिए भारत बुलाया जाएगा। इस दौरान उन्हें करीब 55 लाख वार्षिक का मानदेय, पूरी तरह सुसज्जित आवास और स्थानांतरण खर्च दिया जाएगा। इस प्रस्ताव में बताया गया है कि शोध के मामले में अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल करने वाले वैज्ञानिकों को इन शोधवृत्तियों के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
इस नोट में कहा गया है कि चयनित वैज्ञानिकों के सामने यह विकल्प रहेगा कि वे कितने समय के लिए यहां आना चाहते हैं पर ऐसा चयन के तीन साल के अंदर करना होगा। इसमें उम्मीद जताई गई है कि ऐसे उच्चस्तरीय वैज्ञानिकों के आने से अपने संस्थानों को उनके अनुभवों का काफी लाभ हासिल होगा और शोध की दिशा में सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा युवा वैज्ञानिकों को काफी प्रेरणा मिलेगी।
ऐसे योग्य वैज्ञानिकों को इच्छुक संस्थानों में गुणवत्ता के आधार पर चयन से पहले बुलाया जा सकता है। इन प्रोफेसरों को केंद्र सरकार सीधे मानदेय देगी। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पहले 25 वैज्ञानिकों को चुना जाएगा। बाद में इसे बढ़ाकर 100 वैज्ञानिकों तक ले जाने की योजना है। योजना आयोग इस योजना में कारपोरेट जगत के भी शामिल होने की भी उम्मीद कर रहा है।
इस संबंध में अधिकारियों ने बताया कि इसी तरह की योजना चीन ने लागू की थी। इसके जरिए उसने विदेशों में काम करने वाले एक हजार से ज्यादा अपने वैज्ञानिकों को अलग-अलग समयावधि के लिए वापस बुलाने में सफलता हासिल की थी। आस्ट्रेलिया ने भी इसी तरह की योजना बनाकर अपने वैज्ञानिकों को वापस बुलाया था।