नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक यानी कैग पर लगाम कसने को सरकार बहुत जरूरी मानती है। सरकार का मानना है कि एक समय पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन भी आज के कैग प्रमुख विनोद राय की तरह बेकाबू हो गए थे। इसलिए चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने का काम किया गया। अब कैग के भी दुबारा इसी रास्ते जाने के चलते सरकार लगाम कसने की रणनीति बना रही है। यह कहना है सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का।
इस मंत्री के अनुसार सरकार की रणनीति है कि वह संसद में संख्याबल अपने पक्ष करने के साथ ही इसकी पहल कर सकती है और छह महीने या कुछ और समय में इस दिशा में कदम उठाने की कोशिश की जा सकती है। सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा।
असल में, कैग पर लगाम कसने के केंद्रीय मंत्री नारायण सामी के बयान से आए सियासी तूफान से सरकार सतर्क हो गई है और अभी कोई पंगा लेने से बच रही है। मगर कैग को अपने काबू में लेने के लिए वह तैयार बैठी है। कैग को बहुदस्यीय बनाने के लिए सरकार ने शुरूआती होमवर्क कर लिया है।
वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि इस बात में सच्चाई है कि सरकार पहले टी एन शेषन के जमाने में चुनाव आयोग से त्रस्त थी और अब कैग से त्रस्त है। मंत्री का कहना है कि जब जब संवैधानिक संस्थाए लक्ष्मण रेखा पार करने की कोशिश करेगी, सरकार का दायित्व बन जाता है कि वह इन पर लगाम कसे।
मंत्री का तर्क है कि ऐसा करना सिर्फ सरकार का काम नहीं बल्कि हर समझदार व्यक्ति की जिम्मेदारी है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि अभी शीतकालीन सत्र में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश समेत तमाम जटिल मुद्दों पर सरकार फंसी हुई है। लिहाजा, कैग के पर कतरने के इरादे को वे अभी अंजाम देना ठीक नहीं समझ रही।