खेत से उपभोक्ताओं के हाथों में पहुंचने तक होने वाली अनाज की बर्बादी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार एक राष्ट्रीय अनाज अनुसंधान केंद्र स्थापित करेगी। राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन (निफटेम) को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इससे न सिर्फ किसानों बल्कि मिलों, व्यापारियों व आम लोगों को भी फायदा होगा। खास बात यह है कि इस केंद्र में अनुसंधान के जरिए भंडारण व चावल मिलों के उपयोग के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी विकसित की जाएगी। साथ ही मिलों के मजदूरों और प्रबंधकों को प्रशिक्षित करने का भी काम किया जाएगा।
निफटेम के उप कुलपति अजीत कुमार ने बताया कि वर्तमान में इस केंद्र की परियोजना रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सरकार ने इस केंद्र के लिए अनुमति दे दी है। एक से डेढ़ साल में इस केंद्र को स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
कुमार के मुताबिक अनाज देश के लोगों के भोजन का मुख्य हिस्सा है लेकिन उन्नत प्रौद्योगिकी के अभाव में अनाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा बेकार या सड़ जाता है। इससे देश के साथ-साथ किसानों व व्यापारियों का भी नुकसान होता है। आम उपभोक्ता को उच्चस्तरीय अनाज भोजन के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता है।
उन्होंने बताया कि अनाज पैदावार का लगभग 18 से 20 प्रतिशत हर साल भंडारण की उच्च तकनीक के अभाव में सड़ जाता है अथवा बेकार चला जाता है। इसी तरह धान से चावल बनाने के लिए अभी देश की मिलें पारंपरिक तकनीक का ही प्रयोग कर रहीं हैं। भंडारण व चावल और आटा मिलों की प्रौद्योगिकी सुधार के लिए कोई भी केंद्र वर्तमान में अनुसंधान नहीं कर रहा है।
अनुसंधान केंद्र में मिलों के वर्क फोर्स को आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया जाएगा। बेहतर तकनीक के उपयोग से चावल में टूटन कम होगी। इससे मिलों के साथ-साथ आम आदमी को भी उच्च गुणवत्ता का लाभ मिल सकेगा। जाहिर है कि पुरानी प्रौद्योगिकी के कारण ही राइस मिलों में उत्पादन का 30 से 35 प्रतिशत व्यर्थ चला जाता है।