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बहुत खास हैं ताज की ये तस्वीरें, देखिए और समझिए

Thu, 03 Jul 2014 07:02 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, आगरा
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यमुना में बेतहाशा बढ़ा रही सिल्ट भले ही हमारी सरकारों को न खटक रही हो लेकिन इसको लेकर अंग्रेजी हुकूमत बहुत चिंतित रही है।
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सरकारों की इसी लापरवाही के चलते दशक-दर-दशक यमुना में सिल्ट बढ़ती गई। आलम यह है कि यमुना किनारे स्थित स्मारकों के पुरातत्व महत्व के अधिकांश हिस्से सिल्ट में दब चुके हैं।

सिल्ट के चलते पर्यावरण और ऐतिहासिक स्मारकों पर संकट न खड़ा हो, इसके लिए ब्रिटिश हुकूमत हर साल यमुना में डी-सिल्टिंग कराती थी। इसका प्रमाण साल 1936-37 का वह दुर्लभ फोटो है, जिसमें काफी मजदूर ताजमहल के पीछे से यमुना से सिल्ट निकालते दिख रहे हैं।
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दब गई यमुना की ओर जाने वाली सीढ़ियां

देश आजाद हुआ तो सरकारों ने लापरवाही की चादर ओढ़ ली। जिसका परिणाम रहा कि यमुना में सिल्ट बढ़ती गई। कई दशकों से ताजमहल के पीछे डीसिल्टिंग नहीं हुई है। तब यमुना का पानी खान-ए-आलम से टकराकर लौटता था।

77 साल बाद इसी जगह से यमुना लगभग 30 फीट दूर हो गई है। जबकि दशहरा घाट से यही दूरी लगभग 80 फीट से ज्यादा है। नदी की लहरें ताज की नींव से टकराती थीं। अब सिल्ट की वजह ये यह नदी स्मारक से काफी दूर बह रही है।

ताजमहल के पास दशहरा घाट सरीखी सीढ़ियां ही ताज में यमुना की ओर थी। जहां से कभी मुगल शहंशाह ताज में प्रवेश करते थे। लेकिन डीसिल्टिंग न होने की वजह से यह सीढ़ियां सिल्ट के नीचे दबती गईं।

यहां अब बुल्डोजर नहीं चल सकते

समय-समय पर ब्रिटिश शासन ने यहां से सिल्ट निकाली। लेकिन पुरातत्व विभाग के अस्तित्व में आने के बाद आजाद भारत में इन सीढ़ियों को ढूंढने की कवायद नहीं की गई। इसी का परिणाम रहा है कि यहां 24 फीट तक सिल्ट जमा हो गई।

ताजमहल के संरक्षण को देखते हुए इसके पांच सौ मीटर के दायरे में डीजल या पेट्रोल से चलने वाले वाहनों और मशीनों पर प्रतिबंध है।

ऐसे में अब ताजमहल के पीछे सिल्ट को हटाने की कवायद भी नहीं की जा सकती। सिल्ट इतनी मात्रा में जमा हो चुकी है कि मजदूरों को इसे हटाने में महीनों लग जाएंगे।
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जब भर गया था ताजमहल में पानी

डीसिल्टिंग न होने से यमुना की सतह काफी उठ चुकी है। इसलिए अब इसमें पानी छोड़ने पर बाढ़ का खतरा बना रहता है।

साल 1978 में आई बाढ़ के दौरान नदी का पानी ताजमहल के बेसमेंट में घुस गया था।

यह स्थिति तब थी, जब आधे शहर से ज्यादा में पानी भर गया था। ऐसे में यदि अब 1978 जैसे हालात हो जाएं तो क्या होगा, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि तब से अब तक यमुना में कई गुना सिल्ट जमा हो चुकी है।
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